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❤️राजस्थान का राइट टू हेल्थ बिल।❤️
जानते हैं ,इसके बारे में।
यह कैसा बिल है।
एक भूखा प्यासा आदमी शहर की गलियों में भटक रहा होता है और उसे एकदम से एक अच्छा सा होटल दिखता है ।वहां जाकर वह होटल संचालक को कहता है उसे जोरो से भूख लगी है ,उसे खाना दे दो । उसको एक अच्छी सी टेबल पर बिठाया जाता है।
मेनू कार्ड सामने आ जाता है । वह बहुत सारा खाना ऑर्डर करता है। सारा खाना उसको परोसा जाता है और पेट भर खाने के बाद जब वेटर बिल पेश करता है तो वह आदमी जिसको खाना खाने के बाद ताकत आ चुकी होती है आग बबूला हो जाता है और कहता है इमरजेंसी में आया था और इसकी वजह से मुझे खाना फ्री में मिलना चाहिए। मैं इसका कोई पैसे देने वाला नहीं हूं ।अगर आपको पैसे चाहिए तो सरकार से ले लीजिए ।
होटल मालिक उसे समझाता है ऐसा नहीं हो सकता, बिल तो तुम्हें देना पड़ेगा ।इस बीच उनकी कहासुनी हो जाती है। वह आदमी अपने रिश्तेदारों को और अपने जानकारों को बुला लेता है और बिना सारा मामला जाने ही रिश्तेदार होटल संचालक की और वहां के वेटर की पिटाई कर देते हैं ,और होटल में भी तोड़फोड़ कर देते हैं।
बिचारा होटल मालिक! रो पीटकर रह जाता है। सरकार के पास गुहार लगाता है उसके खाने के पैसे देने के लिए। बड़ी सी फाइल बनाकर उसमें उस कस्टमर ने क्या-क्या खाया ,उसका बिल, उससे रिलेटेड सारी फोटोग्राफ्स सरकार को देता है। लेकिन फिर भी सरकार नहीं मानती और उसे कहते हैं कि तुम्हारी फोटोग्राफ क्लियर नहीं है, तुम्हारा बिल सही नहीं है ,इसलिए तुम सारी चीजें दोबारा अच्छे से दे दो। बिचारा होटल संचालक दोबारा सारी प्रक्रिया करता है। एक बड़ी सी फाइल बनाकर फिर देता है । कुछ महीनों बाद उसे इंदिरा रसोई के तर्ज पर उसके ₹2000 के खाने के लिए ₹8 दिए जाते हैं।
होटल संचालक सर पीट कर रह जाता है। ऐसा आए दिन उसके साथ होता रहता है । इसी बीच उसके ऊपर उसी कस्टमर ने घटिया खाना देने के लिए शिकायत कर दी है क्योंकि ज्यादा खाने से उसे उल्टी हो जाती है और उसे लगता है कि खाना अच्छा नहीं था। शिकायत निवारण कमेटी के पास केस आता है और होटल संचालक को सारे दस्तावेज पेश करने के लिए कहे जाते हैं ।बिचारा फिर सारे फोटोग्राफ्स ,खाने की क्वालिटी ,अपने सारे लाइसेंस उनके सामने पेश करता हैं लेकिन उस प्राधिकरण में खाने के और होटल व्यवसाय के बारे में जानने वाले कोई होते ही नहीं है ।और इसी वजह से उस होटल संचालक की बात कोई समझ नहीं पाता और उसपर घटिया खाना देने का इल्जाम लगाया जाता है और ₹25000 जुर्माना लगाया जाता है। बिचारा होटल संचालक एक बार फिर सर पीट कर रह जाता है और सोचता है कि इसकी शिकायत वह कोर्ट में करेगा लेकिन उसका वकील कहता है कि वह इसकी शिकायत कोर्ट में नहीं कर सकता क्योंकि उसके पास यह अधिकार ही नहीं है और उसे जुर्माना देना पड़ेगा ।
बेचारा!
इस प्रकार आए दिन होने वाली परेशानी से छुटकारा पाने के लिए एक दिन वह सोचता है कि यह होटल ही बंद कर दे। और उसने ऐसा ही किया और अपना बोरिया बिस्तर समेट कर वह राजस्थान छोड़कर दूसरे स्टेट में जाकर वहां पर एक अच्छा सा होटल शुरू कर देता है। खाना तो उसका पहले से ही अच्छा था, हाइजीनिक था ,क्वालिटी अच्छी थी तो उसका होटल चल निकला और कुछ ही दिनों में उसने अलग-अलग स्टेटस में अपने होटल्स खोल दिए। लेकिन उसकी एक शर्त है राजस्थान से आने वाले कस्टमर को वह दुगनी रेट में अपना खाना देगा। इसलिए उसने सबके आधार कार्ड देखना शुरु कर दिए। लेकिन फिर भी राजस्थानी वहां पर जाते, पेट भर के खाना खाते, दुगना पैसा देते , और उसकी तारीफ के पुल बांधते वाह! क्या खाना है! इससे उन्हें किसी भी तरह से कोई परेशानी नहीं होती थी।
बस यही है राजस्थान का राइट टू हेल्थ बिल ।✅✅
💯जनता, सोचो, समझो और सरकार की वोट बैंक की नीति से अपने आप को बचा लो।🙏🙏
डॉ मंजू राठी। किशनगढ़।
Author: Manju Rathi
जीवन दाता

जीवन दाता
अपने पापा की लाडली बिटिया है मंजू । पापा अब 75 वर्ष के हो चुके हैं ।वे अपनी बेटी से बेहद प्यार करते हैं। वह भी अपने पापा से बहुत प्यार करती है । उनकी छोटी सी तकलीफ भी उसे बर्दाश्त नहीं होती है, फिर आज तो उनका ऑपरेशन था। दो दिन से वह बहुत परेशान थी, डॉक्टर जो थी। ऑपरेशन का भला बुरा अच्छे से जानती थी । डॉक्टर होने के बावजूद भी अपने पापा के बारे में सोच कर डर जाती थी। पापा को अनेक मेडिकल प्रॉब्लम्स भी थी और रीड की हड्डी में भी जकड़न थी इसलिए उसे पता था कि भूल देने में तकलीफ आ सकती थी, पर मजबूर थी , ऑपरेशन करवाना जरूरी था। दोनों साइड में हर्निया था और उसमें आते आकर बार-बार फंस रही थी और कभी भी कोई भी बड़ी तकलीफ हो सकती थी, यह वह जानती थी ।अगर कभी आते फंस गई और निकल नहीं पाई तो इमरजेंसी हो सकती थी। सबकुछ जानती थी पर किसी से शेयर नहीं कर सकती थी। अगर किसी को बता देती तो शायद उन्हें भी टेंशन हो जाती। इसलिए डरते हुए भगवान पर भरोसा रखते हुए ऑपरेशन की हामी सभी से करवा ली थी।
कहावत है, बेटा मां का और बेटी बाप की। शायद सही भी है । मैंने तो इस कहावत को सार्थक होते हुए सब जगह पर देखा है। बेटियां बाप को ज्यादा ही प्यारी होती है। मेरी भी एक बेटी है और मुझे पता है वह मुझसे ज्यादा अपने पापा से अपनी सारी बातें शेयर करती है। और उसके पापा भी उसकी हर फरमाइश पूरी करते हैं ,कभी-कभी तो मुझे भी इस बात का पता नहीं चलता। मानती हूं, मुझे डॉक्टर बनाने में पापा से ज्यादा मेरी मां का हाथ था पर फिर भी मैं पापा की लाडो हूं ।पापा मेरी कोई बात टालते नहीं है।
जिंदगी के सफर में ऐसे अनेक मोड़ आते हैं जहां आपको अपनों से दूर होना पड़ता है । बेटियों के साथ भी यही होता है ।मेरे साथ भी यही हुआ ,जमाने की रीत जो है। पहले डॉक्टर की पढ़ाई के लिए और बाद में शादी की वजह से मैं कभी मेरे माता-पिता के पास 10 दिन से ज्यादा नहीं रह पाई। 17 की उम्र में घर छोड़ दिया और उसके बाद हमेशा के लिए पराई हो गई । पर फिर भी यह बाप बेटी का रिश्ता अनोखा था ।उम्र के इस पड़ाव पर पहुंच कर भी पापा का प्यार कम नहीं हुआ था।
आज अपने जीवनदाता की जिंदगी के इस मोड़ पर , उनकी जिंदगी की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले कर उनका यह ऑपरेशन करवाना बहुत ही कठिन था मेरे लिए ।पर करना तो था ही। डॉक्टर थी, जानती थी सब कुछ । डॉक्टर अपने मरीज का जब इलाज करते हैं तो वे बहुत ही सजग और कॉन्फिडेंट होते हैं ।पर जब कभी अपनों के साथ कुछ होता है तो वे नेगेटिव ज्यादा सोचते हैं । मेरे साथ भी यही हो रहा था। मैं पॉजिटिव की जगह नेगेटिव बातें ज्यादा सोच रही थी। सब कुछ अच्छा होगा यह दिल कहता है पर दिमाग में उलटे सीधे विचार आते ही रहते हैं यह एक ह्यूमन टेंडेंसी है । इसीलिए तो ज्यादातर डॉक्टर अपने रिश्तेदारों को इलाज खुद नहीं करते। सब पर विश्वास होता है पर दिल फिर भी घबराता है। पता नहीं क्या होगा? कैसे होगा? सब ठीक तो हो जाएगा ना ?वगैरा-वगैरा।
मेरे साथ भी यही हो रहा था। दो दिन से दिमाग में एक उलझन थी, सब कुछ ठीक हो जाएगा ना ? अपने सारे डॉक्टर दोस्तों से डिस्कशन कर रही थी ।घर वालों को भी समझा रही थी। सब कुछ ठीक हो जाएगा यह दृढ़ विश्वास था। बाकी लोग यह नहीं जानते थे कि क्या तकलीफ आ सकती थी इसलिए उनकी इच्छा थी कि अपने ही शहर में अच्छे डॉक्टर से ऑपरेशन करवा लेते हैं। पापा की भी यही इच्छा थी । पर मैंने इसे स्वीकार नहीं किया क्योंकि मैं जानती थी बेहोशी देने से लेकर ऑपरेशन और ऑपरेशन के बाद के सारे कॉम्प्लिकेशंस के बारे में । इन सारी चिंताओं ने मुझे परेशान कर रखा था और इसीलिए मैंने जहां पर मेरे दोस्त मौजूद हो , ऑपरेशन के दौरान मेरी उनसे बात होती रहे और जिस अस्पताल में सारी सुविधाएं हो उसको चुना।
ऑपरेशन के तीन घंटे हमारे लिए बहुत भारी होने वाले थे। मेरे भाई , मेरी मां और हम सभी बहुत ही टेंशन में थे।मेरी मनोदशा उनसे कुछ अलग थी। शायद मेरे अलावा इसे और कोई समझ भी नहीं पाएगा ,
क्योंकि वे डॉक्टर नहीं है और मैं डॉक्टर हूं , यही फर्क है ।हर एक स्टेप की जानकारी होने से उसके होने वाले नेगेटिव इफेक्ट्स पर ज्यादा ध्यान जा रहा था ।स्वाभाविक था, यह एक मानव फितरत है फिर मैं उससे अपवाद कैसे रह सकती थी।
सुबह पापा से फोन पर बात हो गई ।पापा की आवाज थोड़ी धीमी थी। हमेशा बुलंद आवाज में बात करने वाले पापा की धीमी आवाज सुनकर मेरा दिल वैसे भी बैठ गया। उनके भी मन में डर था । पहली बार वे अस्पताल में किसी ऑपरेशन के लिए भर्ती हुए थे, वह भी इस उम्र में । उनकी भी ऑपरेशन कराने की इच्छा नहीं थी तभी तो एक साल तक इस बीमारी की तकलीफ झेल रहे थे पर अब तो गले तक आ गया था । तकलीफ बढ़ गई थी और ऑपरेशन के अलावा कोई चारा नहीं था ।भाइयों को डर लग रहा था इसलिए उनका भी इस उम्र में ऑपरेशन के बिना होने वाले उपायों की तरफ रुझान ज्यादा था ।पर मैं ही जानती थी अगर ऑपरेशन नहीं करवाया तो कभी भी इमरजेंसी हो सकती थी और उस वक्त और भी कठिनाइयां बढ़ सकती थी और जटिलताएं आ सकती थी और ऐसे में कभी-कभी जान पर भी बन आती है। इसी वजह से आखिर में ऑपरेशन करवाना है इस बात पर मुहर लगा दी गई। पापा का मन ना होते हुए भी अपनी तकलीफ से और मेरे डर से उन्होंने हां कर दी।
यह सत्य है कि जिससे हम ज्यादा प्यार करते हैं उनके लिए हम डरते भी ज्यादा है । मेरा भी यही हाल था। पापा को ऑपरेशन थिएटर में ले जाया गया और मेरा दिल बेचैन हो गया । सुबह-सुबह सभी भगवान को याद कर रही थी ।हनुमान चालीसा भी पढ़ ली ।आप सोचेंगे डॉक्टर होकर भी यह सब किस लिए ? डॉक्टर का हमेशा अपने विश्वास के साथ साथ एक अदृश्य ताकतपर विश्वास रहता है जिसे कोई भगवान कहता है तो कोई और कुछ ।और उसी की बदौलत वह सब का इलाज आसानी से कर पाता है। मैं डॉक्टर थी तभी तो यह सब कर रही थी । एक विश्वास होना जरूरी था । किसी पर विश्वास करके अगर कोई काम किया जाए तो उसके पूरे होने के चांसेस ज्यादा होते हैं । डॉक्टर होने के नाते सब भले बुरे का ज्ञान था और इसीलिए ऊपर वाले पर विश्वास जरूरी था ।कभी-कभी ज्ञान से ज्यादा अज्ञानी होना अच्छा होता है यह मेरी समझ में आ रहा था लेकिन अब मैं अज्ञानी नहीं बन सकती थी ,यही तो मेरी सबसे बड़ी कमजोरी थी।
ऑपरेशन रूम की सारी बातें मैं जानती थी ।मरीज से अच्छे से बात की जाती है ,उन्हें वहां क्या होता है और उनके साथ क्या करेंगे इसकी सारी जानकारी दी जाती है ।मरीज को टेंशन होती है और डॉक्टर उस टेंशन को दूर करने का यत्न करता है ताकि उसका मरीज रिलैक्स रहे। पापा के साथ भी यही हुआ ।उन्हें पीठ में इंजेक्शन लगाने की प्रक्रिया की जानकारी दी गई । चार बार कोशिश करने के बाद भी पीठ में इंजेक्शन लगने की प्रक्रिया सफल नहीं हुई तो पूरा बेहोश करने की प्रक्रिया शुरू की गयी और उसके साथ ही मेरा दिल घबरा गया। पापा की गर्दन में जकड़न की वजह से श्वास नली में ट्यूब डालना मुश्किल होगा यह मैं जानती थी। भगवान से प्रार्थना कर रही थी कि सब कुछ ठीक हो जाए। डॉक्टरों की मेहनत और ऊपर वाले की मेहरबानी से बेहोशी की प्रक्रिया शांति से हो गई । ऑपरेशन शुरू हो गया। मन में डर तो था पर सब ठीक चल रहा था इसलिए दिल शांत था ।
मेरा मन किसी भी चीज में नहीं लग रहा था। बार-बार नजरें घड़ी की तरफ उठ रही थी ।एक एक पल युगो जैसा लग रहा था । सर्जरी में वक्त लगेगा यह मालूम होने के बावजूद मन बेचैन था। ऐसे लग रहा था कि सर्जन इतनी धीरे सर्जरी कैसे कर रहे हैं । पर मेरा यह सोचना मेरी बेचैनी और मेरे उतावलेपन की वजह से था । मेरा यह सोचना लाजमी भी था एक बेटी के नाते पर एक डॉक्टर के नाते यह सोचना गलत था ।यहां में बेटी ज्यादा थी और डॉक्टर कम थी यह मैं जानती हूं । दो घंटे बीत गए । सर्जरी पूरी हो गई और पापा को रिकवरी रूम में लाया गया। पापा होश में थे लेकिन थोड़ा नींद में थे । मैंने फोन से वीडियो कॉल किया। पापा ने मुझे देखा और उस अर्ध बेहोशी में भी हल्का सा मुस्कुरा दिए । वह पल मेरे लिए एक अनोखा, अद्भुत अहसास था। जिंदगी में शायद बहुत कम बार मैंने ऐसा महसूस किया था । जीवनदाता का वह हल्का सा मुस्कुराना मेरा सारा टेंशन खत्म कर गया। मन शांत हो गया। मन में चल रही कशमकश दूर हो गई । दिमाग में चल रहे हजारों सवालों के जवाब मिल गए ।अनायास ही दुआ में हाथ जुड़ गए और दो बूंदे आंखों से गालों पर सरक आई।
डॉ मंजू राठी।
एमबीबीएस एमडी ।
एलएलबी एलएलएम।
ब्लॉगर ,लेखिका ।
दोस्तों का खजाना — बचपन की यादें
दोस्तों का खजाना
दोस्तों का खजाना इस पुस्तक से ली गई पहली कहानी यहां पर पोस्ट की जा रही है ।आपके सुझाव हमारे लिए बेहद उपयोगी रहेंगे, तो प्लीज अपने कमेंट्स हमें जरूर दीजिए।
बचपन की यादें
मैं अरूण एक बिजनैसमेन हूं। दिल्ली में रहता हूँ। लोग कहते है- दिल्ली ऐसी जगह है जहाँ लोगों के पास वक्त ही नहीं होता। उनकी जिन्दगी, उनका घर और ऑफिस के इर्द गिर्द ही रहती है। वक्त के नाम पर वे अपने क्लाइंट के साथ चाय पी लेगें या फिर ऑफिस में ही काम के सिलसिले में कुछ इधर-उधर की बातें कर लेंगें । बस, यही उनका एंटरटेनमेंट है। इसके अलावा घर और घर में क्या है? या तो टी. वी. के सामने बैठ जाते है या फिर लॉन में अकेले बैठे-बैठे चाय की चुस्कियाँ , कभी-कभी एखाद पैग लेकर घंटो बैठे रहते हैं या फिर मोबाईल पर लगे रहते है। कोई बात करने वाला नहीं, सब अपने-अपने काम में व्यस्त रहते हैं। पडोसियों को भी किसी से मतलब नहीं होता। कहा जाये तो अपने पडोसी कौन है यह भी आपको पता नहीं होता। आपके बगल वाले फ्लैट में कौन रहता है, आपके ऊपरवाले फ्लैट में कौन रहता है, आपके आगे किसका मकान है? कुछ पता नहीं होता।
एक जमाना था जब पूरे मोहल्ले का बायोडेटा सबके पास होता था। कौन कहाँ रहता हैं, किसके घर में कितने लोग है, कौन क्या काम करता है? कहाँ से आया है? क्या खाता है, क्या पीता है, सबकुछ सभी जानते थे। अपने मोहल्ले के अलावा पूरे एरिया के लोगों से जान पहचान होती थी और अब कुछ ही सालों में यह हो गया है कि किसी मित्र के घर जाना है तो भी पहले अपॉयमेंट लेनी पड़ती है। एक वो वक्त था जब आधी जिन्दगी दोस्त के घर पर ही निकलती थी। अक्सर खाना-पीना वही होता था। ना तो उनके माँ-बाप को कोई कष्ट होता था और ना ही कोई फिक्र रहती थी। सबकुछ स्पष्ट रहता था। कुछ छुपाने जैसा नहीं होता था।
अरूण, आज काफी उदास था। उदासी का कारण वह भी नहीं जानता था। पर उसको कुछ अच्छा नहीं लग रहा था। वह ऑफिस से भी आज जल्दी घर आ गया था। घर आया तो नौकरानी से पता चला कि बीवी किसी के घर किटी पार्टी में गयी है। बच्चे कॉलेज के बाद अपने दोस्तों के साथ कहीं गये है। घर में वो और उसका प्यारा कुत्ता ‘मार्शल’ और नौकरानी है। यह देखकर वह और उदास हो गया। उसे उदास देखकर मार्शल को भी अच्छा नहीं लगा। और वह उसके आगे-पीछे घुमने लगा और अपनी दूस हिलाते हुए गुरे गुर्र की आवाज में पूछने लगा, “आपको क्या हुआ है? अरूण ने काफी देर तक तो उसकी तरफ ध्यान हीं नहीं दिया पर जब वह थोड़ा तेज आवाज में गुरनेि लगा तो उसने मार्शल की तरफ देखा । उसकी आँखों में एक अजीब-सा अपनापन था। अपने मालिक को उदास देखकर वह परेशान हो गया था । जब अरूण ने उसके सर पर प्यार से हाथ फेरा तो वह एकदम से उछलकर भाग गया और कोने में रखी अपनी बॉल को मुँह में दबाते हुए वापस आकर दुम हिलाने लगा। अरूण समझ गया, वह क्या चाहता है। अरूण उसकी तरफ देखकर मुस्कुराया और बोला, “रुक, अभी चलते हैं। मैं कपडे बदल लूँ, फिर खेलते हैं।”
आज्ञाकारी बच्चे की तरह वह चुपचाप बॉल को चाटता हुआ एक छिपकली की तरफ फर्श पर चिपककर बैठ गया। उसकी यह हरकत देखकर अरूण को हँसी आ गयी। अरूण ने अपना पसंदीदा कुरता पाजाना पहना। मुँह धोया और नौकरानी को आवाज लगाते हुऐ बाहर आ गया। मार्शल तो पहले ही दौड़कर बाहर आ चुका था।
अरूण लॉन में टहलने लगा और मार्शल उसके पिछे पिछे। लॉन में इधर-उधर बिखरे हुए मार्शल के खिलौनों को वह लात मारकर दूर फेंकता और मार्शल तेजी से उनकी तरफ दौड़ता और उन खिलौने को लाकर अरूण के पांव के पास छोड़ देता। अरुण फिर उसे दूर फेंक देता। इस खेल में दोनों को ही मजा आ रहा था तभी नौकरानी ने चाय का ट्रे लाकर मेज पर रख दिया।
“सर! चाय।” उसने कहा।
“लक्ष्मी, आज शाम को खाने में क्या बनेगा?” अरूण ने कप हाथ में लेते हुए
पूछा।
“सर, मैडम ने तो मना कर दिया कि वह कुछ नहीं खायेगी और बच्चों ने कहा उन्हें आने में देर हो जायेगी और वे बाहर से ही खाना खाकर आयेंगे। सिर्फ आपके लिए ही खाना बनाना है। कहिए सर, आपके लिए क्या बनाऊँ?” उसने कहा।
‘अच्छा!” एक लम्बी सांस लेते हुए अरूण ने कहा, “सिर्फ मैं ही खाने वाला हूँ।
“जी सर!” उसने सिर झुकाकर कहा।
लक्ष्मी उसके जवाब का इन्तजार कर रही थी।
उसने केटल से चाय कप में उंडेली,उसका एक सिप लेते ही उसे मजा आ गया।
“लक्ष्मी, आज चाय में अलग स्वाद है! आज मेरे टेस्ट की चाय बनी है। “
“जी सर! आज मैडम नहीं है ना, तो मैंने आपके टेस्ट वाला चाय मसाला डाल दिया।” लक्ष्मी ने नजरे झुकाकर कहा।
‘वाह लक्ष्मी! बहुत अच्छा किया। अब बता मेरे पसंद के हिसाब से खाने में क्या बनायेगी।” अरूण ने बड़े ही प्यार से पूछा।
‘आप जो कहो सर, मैं वह बना दूंगी।” लक्ष्मी ने अरूण की तरफ देखते हुए कहा।
अरुण चाय की चुस्कीयाँ लेता रहा। लक्ष्मी वहीं खड़ी खड़ी उसके जवाब का
इन्तजार करने लगी। चाय खत्म करके कप मेज पर रखते हुऐ उसने कुछ सोचते हुए, कहा, “लक्ष्मी, आज मौसम अच्छा है, शायद बारिश आने वाली है, कुछ गरमागरम खाने का मन कर रहा है।”
‘आप बताइये सर, क्या बनाऊँ? पकौड़े बनाऊँ?” उसने मासूमियत से पूछा।
अरूण कुछ सोचने लगा, फिर एकदम से मन में कुछ बोला, “लक्ष्मी सून, एक काम कर- तू आलू उबाल ले, और सामने वाली डेयरी से बड़ी
वाली ताजा ब्रेड ले आ।”
‘आज ब्रेड रोल बनाते हैं। और हाँ, आज मैं बनाऊँगा। तू आलू छिलने के बाद मुझे बुला लेना।”
लक्ष्मी आश्चर्य से अपने मालिक की तरफ देखने लगी। उसने कभी मालिक को किचन में काम करते हुए नहीं देखा था। मालिक तो हमेशा जो बनता बिना कुछ कहे ही खा लेते थे और आज वो खुद बनायेंगे? वह वहीं खड़ी खड़ी आश्चर्य से अरूण की तरफ देख रही थी।
” अरे ! तू अभी तक यही खड़ी है, जा ना अब, जोर से भूख लग रही है। जल्दी से तैयारी कर ।” अरूण की आवाज सुनकर वह एकदम से हड़बड़ा गयी, उसे इस तरह हड़बड़ाते हुए देखकर अरूण ने कहा, ” अब जा ना, जा, तैयारी कर ।”
” जी सर ! ” कहते हुए वह वहाँ से भाग छूटी। लक्ष्मी चली गयी। अरूण वही बैठा-बैठा कुछ सोच रहा था। मार्शल गार्डन में अपने खिलौनों के साथ इधर-उधर दौड़ रहा था।
अरूण को अपना बचपन याद आ गया। वे चार भाई-बहिन थे। अरूण तीसरे नंबर का था। सबसे छोटी बहन और दो बड़े भाई। चारों अपने माँ-बाप और दादी के साथ रहते थे। दादाजी का देहांत जब वे छोटे थे तभी हो गया था। सारी घर की जिम्मेदारी उनके पापा ने उठा ली थी। मिडिल क्लास फैमिली से होते हुए भी उसने कभी कोई कमी महसूस नहीं की थी। वे फ्लैट में रहते थे। आस-पड़ोस बहुत अच्छा था। सब मिल जुलकर रहते थे। त्योहार साथ में मनाते थे। पिकनिक पर जाते थे, कभी फैमिली के साथ तो कभी बच्चे-बच्चे। कभी कोई पार्टी तो कभी कोई प्रोग्राम ।छुट्टीयों का सबको इन्तजार रहता था। स्कूल शुरू होने से पहले प्री-मानसून की बारिश जब आती थी तो हमेशा घर में ब्रेड रोल बनते थे, घर वालों के साथ-साथ पड़ोसियों के लिये भी । और लॉन में बैठकर सब मस्ती में उनका स्वाद लेते हुए तारिफों के पुल बांध देते थे। हम चारों भाई-बहिन को माँ की मदद करनी होती थी, तभी तो पूरे अपार्टमेंट के लिए ब्रेड-रोल बन पाते थे। दोपहर से ही हम इस काम में लग जाते थे और शाम को सभी के घर आने के बाद ब्रेड-रोल पार्टी होती थी और उस वक्त जो खुशी का माहौल होता था उसे जुबां में बयान करना मुश्किल था।
आज अरूण को इतने सालों बाद उन ब्रेड़-रोल की याद आ गयी थी। इतने साल में ऐसी भी कोई डीश होती है, यह भी उसके स्मरण पटल से विस्मृत हो गयी थी। बचपन के दिन ताजा हो गये थे। सुबह से उसके मन पर छायी हुयी उदासी गायब हो गयी थी। उसके शरीर में एक अजीब सी स्फूर्ति आ गयी थी। उसका मन उसकी बचपन की यादों में हिलौरे खा रहा था। उसका अपना घर, वो मोहल्ला, वो गलियाँ सबकुछ तो एक साथ उसके दृष्टिपटल पर सैर कर रहे थे। वह उन बचपन की यादों में अपने आप को देखकर मुस्कुरा रहा था।
मार्शल खेलकर थक गया था। वो उसके पाँव के पास आकर बैठ गया था। आज उसे मार्शल पर भी बहुत प्यार आ रहा था। उसके सर पर हाथ फेरते हुए ट्रे में रखे हुए बिस्किट उसे खिलाते हुए उसने कहा,
“पता है मार्शल, बरसों बाद आज मैं ब्रेड़-रोल बनाऊंगा। देखा, आज भी वैसा ही मौसम हो रहा है। शायद चंद मिनटों में बारिश शुरू हो जाये। तू खायेगा ? तेरे लिए बिना मिर्ची का बनाऊँगा खायेगा ना!” मार्शल ने अपने कान खड़े करके शायद सबकुछ समझ में आ गया हो इस तरह अपनी स्वीकृति दे दी। तभी लक्ष्मी ने आवाज दी,
“सर, सारी तैयारी हो गयी है।”
अरूण उठकर जाने लगा तो मार्शल भी उसके पीछे-पीछे चल दिया। अरूण सीधा किचन में घुस गया और मार्शल किचन के गेट के सामने पसर गया और अपने मालिक को किचन में काम करते हुए आश्चर्य से देखता रहा।
अरूण ने कुछ पल के लिए आँखें बंद की शायद कुछ याद कर रहा हो और फिर लक्ष्मी को ऑर्डर देने लगा, “लक्ष्मी ये मसाले निकाल दे, बारीक-बारीक प्याज काट दें, हरी मिर्च काट दें, लहसुन छील दें।” लक्ष्मी ने सारे मसाले निकाल दिये, बाकी कार्य भी कर दिए। उसने आलू को हाथ से पिसा। अपनी याददाश्त को स्ट्रांग करते हुए माँ ने सिखाये थे जैसे के जैसे सारे मसाले उसमें डालकर छोटी-छोटी गोलियाँ बना दी। फिर ब्रेड़ की किनारे हटाने के बाद उसे हाथ में रखकर पानी में भिगोने के बाद सारा पानी दबाकर निकाल दिया और उसमें एक आलू की गोली रखकर शानदार तरीके से ब्रेड रोल बनाये और एक थाली में सजाकर रख दिये।
हाथ धोते हुए लक्ष्मी से कहा, “लक्ष्मी, कढ़ाई में तेल लेकर उसे गैस पर चढा
दे।” तभी डोअरबेल बजी।
“लक्ष्मी, तू देख कौन है, मैं ही तेल चढ़ा दूंगा।” कहते हुए उसने कढ़ाही में तेल ठंडेल दिया। लक्ष्मी चली गयी। कुछ देर तक लक्ष्मी नहीं आयी तो गैस की फ्लेम को कम करके वह बाहर आ गया। उसने देखा, कोई मेहमान आये हैं जिन्हें लक्ष्मी ने ड्रॉइंगरूम में बिठा दिया है।
“कौन है लक्ष्मी” उसने बाहर आते हुए आवाज दी।
“सर जी, यह अपने नये पड़ोसी है। कुछ दिन पहले ही अपने बगल वाले बंगले में रहने आये है।” लक्ष्मी बोलते हुए किचन में चली गयी।
“अच्छा!” दीर्घ श्वास लेते हुए अरूण ने कहा । माथे पर सलवटे आ गयी। “ये क्यों आये है? ” मन में कहा। पर अब तो मिलना ही पड़ेगा। चेहरे पर जबरदस्ती मुस्कुराहट लाते हुए वह ड्रॉइंगरूम की तरफ बढ़ गया। अरूण जैसे ही अंदर आया, वे लोग खड़े हो गये। उन्होंने हाथ जोड़कर” ‘नमस्ते'” की। अरूण ने भी हाथ जोड़ दिए और उनको बैठने का इशारा करते हुए खुद भी एक सोफे के कोने में धंस गया।
अरूण ने प्रश्न भरी नजरों से उनकी तरफ देखा। वे समझ गये अरूण क्या कहना चाहता है। इतने में लक्ष्मी पानी ले आयी। ट्रे रखकर वह चली गयी। “लिजिए, पानी लिजिए”, अरुण ने कहा।
पानी का गिलास हाथ में उठाते हुये, उन्होंने कहा, “मैं लोकेश शर्मा, केमिकल इंजीनियर हूँ। मेरी कंपनी ने यहाँ एक प्रोजेक्ट लाँच किया है। उसी के सिलसिले में मैं सूरत से यहाँ दिल्ली आया हूँ। अब कुछ साल यही रहना है। कुछ दिन पहले इस बंगले में शिफ्ट हुये हैं। “
“यह मेरी वाईफ है, ‘शिल्पी’ और ये मेरे बच्चे ‘महक और मानव’ “उन्होंने अपनी फैमिली की तरफ इशारा करते हुए कहा।
अरूण ने मुस्कुराते हुए उनका अभिवादन किया। अरूण की नजरों में अभी भी प्रश्न था। उसे भौंपते हुए लोकेश ने कहा,
“हमें यहाँ आये कुछ दिन हो गये थे पर आस-पड़ोस में कौन है, यह हम नहीं जानते थे तो सोचा, आप लोगों से मुलाकात की जायें, इसलिए चले आयें।”
” अच्छा किया।” अरूण ने संक्षिप्त में जवाब दिया। अभी भी अरूण को उनके आने की खुशी नहीं थी।
वह अभी भी उन्हें बिन बुलाये मेहमान ही समझ रहा था , उसकी उलझन को भाँपते हुए लोकेश ने कहा,
‘मुझे पता है आप अरूण जी है। आप एक बिजनैसमेन है। आपकी फैमिली के बारे में मुझे कुछ-कुछ जानकारी है। मैं थोड़ा सोशल किस्म का इंसान हूँ। जहाँ भी जाता हूँ अपने नये-नये दोस्त बनाने की कोशिश करता हूं। खासकर अड़ोसी -पड़ोसी की जानकारी होना जरूरी होती है। दुःख-सुख में रिश्तेदारों से ज्यादा आस-पड़ोस ही काम आता है। यह मेरा अनुभव है।” अरूण को पता नहीं क्यों यह इंसान दिलचस्प लगा। उसे भी अकेलेपन से
बोरियत हो गयी थी तो सोचा, अच्छा है। आज इसके साथ ही कुछ गपशप कर लेते हैं।
“मुझे नहीं पता था- आप यहाँ रहने आये हो।” अरूण ने सकुचाते हुए कहा। वो थोड़ा-सा गिल्टी भी महसूस कर रहा था, क्योंकि उसे अपने पड़ोस में कौन आया और कौन गया इसका भी पता न था। एक वो वक्त था, जब उसे सभी के बारे में सब कुछ पता होता था और आज ये वक्त है।
‘अच्छा, क्या लेंगें आप।” अरूण ने शिष्टाचार के नाते पूछा। “
‘कुछ नहीं। हम तो सिर्फ “हाय-हैलो” करने आये थे।” इस बार उसकी पत्नि
ने जवाब दिया। “भाभीजी कहीं नजर नहीं आ रही?” इधर-उधर नजरें दौड़ते हुए शिल्पी ने पूछा।
“ओह ! वो – वो कहीं बाहर गयी है. अभी आती ही होगी।”
“लक्ष्मी, सबके लिए कॉफी बनाना प्लीज।” अरूण ने लक्ष्मी को आवाज लगाई।
” आपके बच्चे भी नजर नहीं आ रहे, मैंने सोचा, बच्चों से भी उनकी दोस्ती करवा दूँ ताकि नये शहर में उनका मन जल्दी लग जाये।” बच्चों की तरफ देखते हुए लोकेश में कहा।
“सॉरी, आज मैं घर पर अकेला ही हूँ। सभी बाहर गये हैं। अगली बार मैं खुद इन्हें बच्चों से मिलवा दूंगा।” महक और मानव की तरफ देखते हुए अरूण ने कहा।
“अच्छा, हम चलते हैं, फिर मिलते रहेंगें। आपको डिस्टर्ब कर दिया।” लोकेश ने उठते हुए कहा।
अरूण को थोड़ा बुरा लग रहा था की, घर में मेहमान आये हैं और उसके अलावा घर में कोई नहीं है। अपने आप को संभालते हुए उसने मुस्कुराते हुए कहा, “लोकेश जी, आज मौसम अच्छा है, आप भी फ्री हैं, और मैं भी, तो क्यों न ये शाम हम यहीं बिताये।”
शिल्पी ने प्रश्नसूचक दृष्टि से लोकेश की तरफ देखा। अरूण समझ गया। कहने लगा, “देखिए भाभीजी, इस वक्त मेरी श्रीमती जी तो नहीं है आपको कंपनी देने के लिए पर यकीन मानिए- आप बोर नहीं होगी।”
” अच्छा।” इस बार लोकेश ने कहा और सभी खिलखिलाकर हँस पड़े। वहाँ का माहौल अच्छा हो रहा था। तभी लक्ष्मी आकर वहाँ खड़ी हो गयी।
“सर, वो…. वो….।” वो कहते-कहते रूक गयी।
‘अरे हाँ लक्ष्मी, मैं तो भूल ही गया, वो तेल गैस पर चढ़ा हुआ है और मैं यहाँ बैठे गप्पे लगा रहा हूँ।” उसने उठते हुए कहा। वो किचन की तरफ जाने के लिए मुड़ा ही था की, एकदम कुछ याद करते हुए बोला,
“लोकेश जी भाभीजी, आप पाँच मिनिट बैठिए और फिर देखिए मैं आपके लिए गर्मागर्म ब्रेड रोल बनाकर लाता हूँ।” जवाब का इन्तजार किए बिना ही अरूण किचन की तरफ बढ़ गया।
सभी मेहमान एक-दूसरे की तरफ देखते रहें। उनकी समझ में कुछ भी नहीं आया। कुछ देर वे उनके घर को निहारते रहे। बड़ा ही खूबसूरत घर था। काफी सजा हुआ था। अमीरी की छटा उसमें झलक रहीं थी। वे आपस में ऐसे ही गपशप कर रहे थे, इतने में ही अरूण बाहर आ गया। उन्हें देखकर उसने मुस्कुराते हुए कहा,
“सॉरी, आपको अकेला छोड़ दिया।”
“क्या आप कुकींग करना पसंद करते है?” इस बार शिल्पी ने कहा।
“नहीं! आज बरसों बाद किचन में गया हूँ। बचपन की यादें ताजा करने। ” अरूण ने बड़े ही स्पष्टता से कहा।
‘अंकल, पापा तो कुकिंग मास्टर है।” इसबार महक ने कहा।
‘अच्छा! फिर तो कभी इनके हाथों का स्वाद चखना पड़ेगा।” हँसते हुए अरूण ने कहा।
“श्योर।” लोकेश ने कहा।
” अच्छा, मानव और महक मौसम अच्छा हो रहा है, चलो, तुम लोगों को हमारा गार्डन दिखाते है और वहीं बैठकर ब्रेड रोल का स्वाद लेते है।” अरूण ने बच्चों की तरफ देखते हुए कहा।
सभी उठ खड़े हुए। अरूण आगे-आगे और बाकी सब उसके पीछे-पीछे गार्डन में आ गये।
“वाव ! कितना सुन्दर गार्डन है।” महक ने चहकते हुए कहा। पर जैसे ही उसकी नजर मार्शल पर पड़ी वह अरूण के पीछे छुप गयी।
मार्शल गुर्राकर उठ खड़ा हुआ और दौड़ता हुआ उनकी तरफ आने लगा, तभी अरूण ने जोर से कहा,
“मार्शल, नो!” और उसके पाँव को वही ब्रेक लग गये। वह मुँह से अजीब-सी आवाज निकालते हुए उन चारों को घूर रहा था। पहले अरुण ने उसको पुचकारा और फिर कहा, “मार्शल, गो एण्ड सीट” और एक आज्ञाकारी बच्चे की तरह वह उसके पैरों के पास आकर बैठ गया।
‘आइये, बैठिये।” उसने कुर्सियों की तरफ इशारा करते हुए कहा। सभी बैठ गये। इतने में मार्शल फिर उठ खड़ा हुआ और कभी अजनबियों की तरफ तो कभी अरूण की तरफ देखने लगा। अरूण समझ गया।
” महक और मानव” उसने दोनों बच्चों को कहा, “वो तुम्हारे साथ खेलना चाहता है। जाओ खेलों।” उन दोनों को भी उसके साथ खेलने का मन हो रहा था। दोनों झट से उठ गये और मार्शल के साथ उसके खिलौने के साथ-साथ फुटबाल से भी खेलने लग गये। उन्हें बडा मजा आ रहा था। इतने में लक्ष्मी वहाँ पर कॉफी और ब्रेड रोल ट्रे में सजाकर ले आयी। वाकई मस्त खुशबू आ रही थी। सारा गार्डन महकने लगा।
अरूण ने बच्चों को आवाज लगायी और लक्ष्मी ने सभी को ब्रेड रोल सर्व कर दिये।
” वाह! क्या बात है! अमेजिंग।” पहला ग्रास मुंह में डालते हैं लोकेश ने कहा।
“वाकई, बहुत टेस्टी है।” इस बार शिल्पी ने कहा।
“वाउ ! इट्स सो टेस्टी।” दोनों बच्चों ने भी चहकते हुए कहा। मार्शल सभी की तरफ देख रहा था। तभी लक्ष्मी ने उसके लिए लायी हुयी ब्रेड उसे दे दी। वह ब्रेड मुँह में दबाकर अपनी फिक्स जगह पर जाकर बैठ गया और स्वाद ले लेकर उसे खाने लगा। बच्चें उसकी हरकते देखकर खुश हो रहे थे।
अरूण ने सभी को फोर्स करते हुए पेट भर ब्रेड रोल खिलाये और फिर कॉफी का दौर शुरू हो गया। सभी ने अरूण के ब्रेड रोल की खूब तारीफ की। अरूण को भी विश्वास नहीं हो रहा था की, इतने सालों बाद भी वह ब्रेड रोल बनाना भूला नहीं था।
वह आज बहुत खुश था। उसकी पुरानी यादें ताजा हो आयी थी। उसका मन हल्का हो गया था।
काफी देर हो गयी थी। लोकेश और शिल्पी ने अब अरूण से विदा लेनी चाही।
‘भाई साहब, अब हम चलते हैं। आपसे मिलकर अच्छा लगा। पर भाभीजी से मुलाकात नहीं हो पायी।” शिल्पी ने हाथ जोड़कर विदा लेते हुए कहा ।
‘कोई बात नहीं। कभी हम इन्हें अपने यहाँ आमंत्रित करेंगे।” इस बार लोकेश ने कहा।
” श्योर !” अरूण ने कहते हुए अपने हाथ जोड दिए। वे सभी चले गये। अरूण अपनी बचपन की यादों में फिर से खो गया तभी डोअरबेल बजी और कुछ ही पल में अरूण की श्रीमतीजी ने घर में प्रवेश किया।
” बहुत अच्छी खुशबू आ रही है” घर में घुसते ही रचना ने कहा। ” लक्ष्मी, क्या बनाया है तुमने!” कहते हुए रचना किचन की तरफ बढ़ने लगी तभी उसकी नजर अरूण पर पड़ी और वह वही ठिठक गई।
” अरे अरूण! आप कब आये? आप तो आज लेट आने वाले थे ना। इसलिए मैंने बाहर जाने का प्लान बना लिया। आय एम सॉरी।” रचना ने अरूण के पास सोफे पर बैठते हुए कहा।
“कोई बात नहीं। आज ऑफिस में मन नहीं लग रहा था, तो जल्दी घर आ गया पर यहाँ तो कोई था ही नहीं।” अरूण ने रचना की ओर देखते हुए कहा।
‘आय एम सॉरी, तुम एक कॉल तो कर देते। मैं जल्दी आ जाती।” रचना को थोड़ा-सा गिल्टी फिल हो रहा था।
“अरे, कोई बात नहीं। मैंने आज बहुत एन्जाय किया।” अरूण ने हँसते हुए कहा।
“अच्छा! ऐसा क्या किया? और घर में इतनी अच्छी खुशबू किसकी आ रही है?’ रचना ने अपनी नाक को ऊँची करते हुए सूँघने की कोशिश की।
“आज मैंने ब्रेड रोल बनाये।” अरूण ने धीरे से कहा।
“व्हॉट!” रचना आश्चर्य से सोफे पर उछल पड़ी। अरूण ने अपनी नजरें झुका ली ।
“रियली!” उसे अभी भी आश्चर्य हो रहा था। वह आश्चर्य से उसकी तरफ देख रही थी।
” शादी के बाद एक-दो साल तक तो तुम हमेशा वीक एण्ड पर ब्रेड रोल बनाया करते थे पर जब से बिजनैस में व्यस्त रहने लगे- सब छुटता गया। आय लव योर ब्रेड रोल।”
“मैं खाना खाकर आयी हूँ पर फिर भी ब्रेड रोल जरूर खाऊँगी।” कहते हुए रचना किचन की तरफ जाने लगी।
” रचना, तुम चेंज करके आ जाओ। मैं तुम्हारे लिए ब्रेड रोल बनाता हूँ।”
‘आर यू श्योर?” रचना ने पूछा। “यस डियर।” अरूण ने कहा।
अरूण का आज का अंदाज देखकर रचना को अपने शादी के दिन याद आ गये। जब वह नयी-नयी शादी होकर आयी थी तब अरुण और उसके घरवाले उसका कितना ख्याल रखते थे। उसकी हर इच्छा अरूण बिना कहे ही जान जाता था। वे कितने खुशकिस्मत थे- जब पूरा परिवार साथ रहता था। एक भरा पूरा परिवार था पर जैसे-जैसे वक्त बितता गया, सब बिखरता गया । कोई नौकरी के बहाने, कोई व्यवसाय के बहाने तो कोई और कारण से घर छोड़कर दूसरी जगह बसते गये और एक भरा-पूरा परिवार बिखरता गया । ऐसा नहीं की मैं अभी खुश नहीं हूँ। खुश हूँ पर वो सुकून नहीं।
अरुण अपने व्यवसाय में व्यस्त रहने लगे। मैं बच्चों से फ्री हो गयी। बच्चे बड़े हो गये और दोस्तों की कमी और खाली वक्त को बिताने के लिए मुझ जैसी औरतों ने किटी ग्रुप बना लिया। इन ग्रुप में कुछ वक्त तो बीत जाता है पर वो अंतरंग मित्र नहीं मिलते जिनकी हमें तलाश होती है। इसलिए कभी-कभी लगता है,
“कुछ भी खो जाये
कभी खुद को मत खोना।”
आज अरूण- पहले वाला अरूण वापस आ गया है।
रचना चेंज करके बाहर आ गयी तब तक ब्रेड रोल चटनी के साथ टेबल पर लग चुके थे। रचना को सब्र नहीं था और उसने झट से एक ब्रेड रोल उठाया, थोड़ी सी फूंक मारी और गरमागरम ही मुँह में डाल दिया। वह कुछ ज्यादा ही गर्म था की उसे मुँह खोलकर ठंडी सांस लेनी पड़ी। उसकी ये हरकत देखकर अरूण जोर-जोर से हँसने लगा। रचना ने पहला ब्रेड रोल झट से खत्म किया और उसके बाद ही मुस्कुराते हुए बोली,
“वाह! मजा आ गया।”
“यू आर ग्रेट। अभी भी वो ही टेस्ट है।”
अरूण मुस्कुरा दिया। तभी बच्चे भी आ गये। मम्मी-पापा को इस तरह बैठे हुए देखकर वो भी वहीं रूक गये।
“पापा! आपने बनाये है? ” ब्रेड रोल की प्लेट पर नजर पड़ते ही दोनों बच्चों ने एक साथ कहा।
“वाव !” कहते हुए दोनों ने ही उन ब्रेड रोल पर अपना हाथ साफ करना शुरू कर दिया।
“कहाँ थे तुम लोग अभी तक।” अरूण ने पूछा।
“सॉरी पापा, एक दोस्त के यहाँ पार्टी थी तो आने में देर हो गयी।” इस बार बेटी ने कहा।
“इट्स ओके। पर तुम लोग तो खाना खाकर आये होंगे ना। फिर ये ब्रेड रोल क्यों?” अरूण ने मुस्कुराते हुए कहा।
“हाँ….. खाना तो खाया था पर वापस भूख लग गयी।” इस बार बेटे ने कहा और सभी खिलखिलाकर हँस पड़े। बहुत दिनों बाद चारों एक साथ बैठकर इस तरह गपशप कर रहे थे। अरूण को आज बहुत अच्छा लग रहा था। वह मन ही मन कुछ सोच रहा था।
तभी उसने कुछ याद करते हुए कहा,
” अरे हाँ! अपने पड़ोस में कोई नया परिवार रहने आया है।”
“हाँ एक दो बार ‘हाय-हैलो’ ‘हुयी थी।” इस बार रचना ने कहा।
” आज वो अपने घर आये थे।” अरूण ने कहा।
“अच्छा। ” एक साथ तीनों ने कहा।
” घर पर कोई नहीं था तो मैंने ही उन्हें कंपनी दी।”
“ओह! सो सॉरी।” इस बार रचना ने अपनी नजरें झुका ली।
” अच्छे लोग हैं। मेल-जोल बढ़ाना चाहिए। तुम बच्चों, उनके बच्चों के साथ दोस्ती कर सकते हो।”” अच्छे बच्चें हैं वो।” उसने बच्चों की ओर देखते हुए कहा।
” श्योर पापा।” बच्चों ने कहा।
” अच्छा मॉम थक गये हैं, सोने जाये?”
ब्रेड रोल खत्म करते हुए बच्चों ने कहा और पापा के पास आकर “थैंक्स पापा बहुत टेस्टी थे।” कहते हुए बेटी ने पापा को एक झप्पी दे दी।
“ओ. के. गुड नाईट।” कहते हुए बच्चे चले गये।
“अच्छा, चलें।” अरूण ने भी वहाँ से उठते हुए कहा । रचना चुपचाप उसके पीछे-पीछे चल दी। उसके दिमाग में अभी भी कुछ देर पहले का सीन चल रहा था। आज काफी अर्से बाद पूरा परिवार एक साथ ऐसे बैठा था। उसे बहुत अच्छा लग रहा था।
डॉ मंजू राठी
एमबीबीएस/ एमडी
एलएलबी/ एल एल एम
लेखिका, ब्लॉगर

अपने इस हालत का जिम्मेदार कौन? जनता।

कहने को तो हम मार्बल नगरी में रहते हैं। किशनगढ़ का नाम मार्बल नगरी के नाम से विख्यात है। मार्बल का मतलब संगमरमर जो चमकता हुआ पत्थर है। इस विख्यात मार्बल नगरी का यह हाल देखकर सर शर्म से झुक जाता है ।अगर हमारे यहां कोई मेहमान आना चाहता है तो हमारी नजरें झुक जाती है ।हम चाहते हैं कि वह यहां नहीं आएं या फिर हम सादगी से उन्हें कह देते हैं कि अभी आप मत आइएगा, अगर आप आओगे तो हमारे घर तक शायद पहुंच ही नहीं पाओगे।
इन कुछ वर्षों में ऐसा क्या हो गया? हम इतने मजबूर हो गए क्या? किसी ने हमें मजबूर किया है या हम अपना अधिकार ,अपना हक मांगना भूल ही गए हैं ? या हमारे भी कोई अधिकार होते हैं यह हमें पता ही नहीं है?
जागो, जनता जागो।
किशनगढ़ मार्बल नगरी की हालत तो किसी गांव या ढाणी से भी बदतर होगी ।गांव में भी लोग जागरूक होते हैं , अपनी समस्याओं का हल खुद सुलझाने में समर्थ होते हैं और अगर असमर्थ होते हैं तो पूरा यत्न करते हैं कि उनकी समस्या सुलझ जाए। पर किशनगढ़ की लाखों की आबादी आज भी अपनी समस्याओं के बारे में चुप है। उन्हें तो जो थाली में परोसा गया है, उसे खाने को मजबूर है ।
जनता चुप , नेता चुप ,मीडिया चुप ,सरकार तो चुप ही रहेगी । किसी को कुछ नहीं पड़ी है । कोई एक्सीडेंट से मरे ,कोई अपना हाथ पाव तुड़वा ले, कोई स्कूल, कॉलेज के लिए लेट पहुंचे ,कोई ऑफिस लेट पहुंचे, कोई घंटों जाम में फंसे, कोई अस्पताल देरी से पहुंचे या रास्ते में ही मर जाए, तो किसे फर्क पड़ना है? जिसका नुकसान हुआ है वह दो दिन रो कर रह जाएगा या फिर सरकार को, नेताओं को कोसकर अपनी भड़ास निकाल लेगा और फिर अपनी जिंदगी में मस्त हो जाएगा।
एक जगह से दूसरी जगह जहां हम पांच मिनट में पहुंच जाते थे वहां आधा-आधा घंटे में पहुंच रहे हैं ,उससे हमें कोई फर्क नहीं पड़ता। सिर्फ पेट्रोल और डीजल ज्यादा जलता है, उससे ज्यादा फर्क नहीं पड़ने वाला हमें । संसाधनों का कैसे दुरुपयोग किया जाए यह तो हम बहुत अच्छी तरह से जानते हैं!
हम तो इन सबके आदि हो चुके हैं। हम जनता है , हमारी सहनशक्ति बहुत बड़ी है । जमाने ने हमें सहन करना सिखा दिया है ।और यही भोली भाली जनता अपनों को खोकर, अपना कीमती वक्त बर्बाद करके , दिन भर उड़ने वाले धुएं से अपने फेफड़े खराब करके चुप ही रहेगी।
जनता आप कब जागेंगी? दुनिया में एक दिन मैं पूल बन जाते हैं , एक दिन में कई किलोमीटर सड़कें बन जाती है पर हमारे यहां सालों गुजर जाने के बाद भी कुछ नहीं होता ।
इसमें किसका दोष? सरकार का, नेताओं का, ठेकेदारों का, किसका?
इसमें जनता आपका दोष है।
हमारे यहां सड़क बने या ना बने पर सड़कें आए दिन खुद जरूर जाती है। कोई यह जानने की कोशिश भी नहीं करता कि ऐसा क्यों होता है ? क्योंकि हमें सड़के बने या खुदे ,किसी से कोई लेना देना नहीं। हमें एक रास्ता बंद है तो दूसरा रास्ता मिल जाता है। चाहे हम घंटों फंसे रहे या उसमें घंटों लग जाए अपने डेस्टिनेशन तक पहुंचने में, हमें कहां फर्क पड़ता है । सिर्फ पेट्रोल- डीजल ही तो ज्यादा जलता है, समय तो हमारे पास वैसे भी बहुत है।
आप कहेंगे इसमें हम क्या कर सकते हैं ? यह तो सरकार का काम है, सरकार अपनी मर्जी से काम करेगी, जब मन करेगा काम करेगी, जब मन नहीं करेगा – बंद कर देगी । इसमें कोई बड़ी बात नहीं है ? इसमें किसी का दोष भी नहीं है ? किसी को सवाल जवाब करने की ताकत जनता में बची ही नहीं है। बिचारी अपनी 2 जून की रोटी कमाने में व्यस्त है।
जनता इसमें किसी और का दोष नहीं है , दोष तो सिर्फ जनता आपका । क्योंकि आपको इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। अपना अधिकार मांगना आप भूल गए हैं । 75 साल पहले कोई आया था हमें आजादी दिलाने के लिए ,वैसे ही अभी भी कोई आएगा हमें हमारी समस्याओं से निजात दिलाने के लिए । हम उसी का तो इंतजार कर रहे हैं। शायद हम किसी सांता क्लॉस का इंतजार कर रहे हैं कि वह आएगा और हमारे हक के लिए लड़ेगा और सब कुछ ठीक कर जाएगा। उसी सांता क्लॉस के इंतजार में हम आज भी बैठे हैं।
जागो ,जनता जागो।
डॉ मंजू राठी
एमबीबीएस एमडी
एलएलबी एलएलएम
लेखिका ,समाज सेविका ,ब्लॉगर।
आत्महत्या- एक सामाजिक बुराई
आत्महत्या- एक सामाजिक बुराई।
क्यों ना हो आत्महत्या के कारणों का विश्लेषण?
“मां ने 4 बच्चों संंग कुएं में छलांग लगाई, चारों बच्चों की मौत, मां बची।”
न्यूज़ पेपर में खबर पढ़ी । दिल दहल उठा ,मन खूब रोया।
क्यों ?
क्यों एक मां ने ऐसा किया? क्या वजह रही होगी? उसकी कौन सी ऐसी मजबूरी थी जिससे वह छुटकारा पाना चाहती थी? अगर जिंदगी से ऊब गई थी तो फिर खुद अकेले ही मर जाती, क्यों अपने कलेजे के टुकड़ों को मार दिया? उन मासूमों का क्या दोष था ? वह नासमझ तो इस बात से बिल्कुल अनजान थे कि उनकी मां का क्या इरादा है ? जिन्हें मरने का अर्थ ही पता नहीं वह अपनी मां पर विश्वास करके कुएं में कूद गए ? अगर वह नहीं कूदे तो मां ने उन्हें कुएं में फेंक दिया ? कैसे फेंका ? एक- एक को फेंकते हुए क्या उसका कलेजा नहीं फटा ? उन्हें स्पर्श करते वक्त क्या उसका इरादा नहीं बदला? सुना है, एक तो सिर्फ कुछ ही दिनों का बच्चा था। क्या एक जन्म दात्री ऐसा कर सकती है? जिसने इतनी पीड़ा सहन करके जिन्हें जन्म दिया उन्हीं को स्वयं ने मार डाला ? क्या वजह थी ऐसा कदम उठाने की?
सोचो ,जरा सोचो।
अखबार में खबर पढ़कर उसको नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। कई बार इन चीजों का विश्लेषण करना और सही कदम उठाना भी बहुत जरूरी होता है। जिससे आत्महत्या जैसी सामाजिक बुराइयों पर रोक लग सके।
मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और समाज में रहते हुए उसे ऐसी तमाम खबरों को कभी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
जैसा की ज्ञात हुआ इस महिला के 5 बच्चे थे ।बड़ा बच्चा 7 साल का और छोटा 19 दिनों का। अब देखो, इन 7 सालों में उस महिला ने 5 बच्चों को जन्म दिया, यानी हर सवा- डेढ़ साल में एक बच्चा पैदा हुआ ।सभी जानते हैं , डिलीवरी के बाद एक औरत को वापस अपने शरीर की ताकत लाने में कम से कम 3 साल लगते हैं । पर यह महिला तो हर डिलीवरी के 6-7 माह बाद वापस गर्भवती हो जाती है और फिर बच्चा पैदा हो जाता है । कमजोर शरीर, बच्चों का लालन पोषण, फिर डिलीवरी की वेदना , फिर उस बच्चे को स्तनपान , फिर उनका और घर का काम । वह कोई अमीर खानदान की नहीं थी जिसके पास नौकर चाकर हो , घर का काम कोई और देखता हो, बच्चों को कोई और संभालता हो। वह एक गरीब परिवार से ताल्लुक रखने वाली महिला थी जिसे रोज सुबह उठकर रात तक घर और बच्चों को संभालना होता था और रात को पति को।
सोचो, क्या बीती होगी उस औरत पर। 5 बच्चों की मां ,शरीर से कमजोर, दिन भर अपने संसार में उलझी हुई , कभी किसी से बात करने की फुर्सत नहीं, घर में कोई और औरत नहीं जिसके साथ अपनी मन की बात साझा करें , पति सुबह बाहर जाता है तो घर गृहस्थी चलाने के लिए 2 जून की रोटी जुटाने तक शाम हो जाती है । ऐसे में वह अपनी पीड़ा किसे कहें? क्या रही होगी उसकी मानसिक स्थिति?
अगर उसकी मानसिक स्थिति ठीक नहीं थी तो फिर उसे डॉक्टर को क्यों नहीं दिखाया? आज वह जहां रह रही थी वहां पर आस पास अनेकों अस्पताल है ,जहां पर मुफ्त में इलाज होता है। सरकार ने अनेक योजनाएं शुरू कर रखी है जिसमें मुफ्त में इलाज होता है ,मुफ्त की दवाइयां मिलती है । जहां पर बच्चा पैदा करने से लेकर गर्भनिरोधक उपायों पर अनेक सरकारी योजनाएं हैं । फिर यह परिवार इन योजनाओं से वंचित कैसे रह गया?
7 साल में 5 बच्चे पैदा करना अपने आप में आत्महत्या करने जैसा नहीं है? आप कहेंगे पहले के जमाने में तो 10- 10 बच्चे पैदा कर लेते थे, कुछ नहीं होता था । पर अब ऐसा नहीं है । आज की औरत की और पहले की औरत की मानसिक और शारीरिक स्थिति में बहुत बदलाव आ चुका है। खान -पान ,रहन- सहन सब बदल चुका है।पहले और आज में जमीन- आसमान का फर्क हो चुका है ।आज हम 21वीं सदी में जी रहे हैं, जहां पर मिलावट खोरी, महंगाई , बेरोजगारी ,बढ़ती आबादी ऐसी कई समस्याओं से जूझ रहे हैं। अब हमारा नारा “हम दो- हमारे दो” यह है । सरकार इन योजनाओं पर देश के टैक्सपेयर का करोड़ों रुपए खर्च कर रही हैं और नतीजा क्या? क्या यह उस महिला की मजबूरी थी या फिर सरकारी योजनाओं की विफलता?
सोचो ,जरा सोचो।
पढ़ा था कि महिला ने छलांग लगाई और पेड़ पर अटक गई। अब सोचो ,वह महिला पेड़ पर अटकी हुई है और उसके चार मासूम उस कुएं में डूब रहे हैं, क्या मनोदशा रही होगी उसकी ? इसकी कल्पना भी कर सकता है कोई? गांव वाले आकर उसे बचा लेते हैं और उसके चारों मासूम इस दुनिया से अलविदा कह देते हैं। अब बताओ, अब उस औरत की क्या दशा होगी? एक हत्यारिन का कलंक लेकर कैसे जिएंगी वह। एक औरत होने के नाते, एक मां होने के नाते ,समाज की बुद्धिजीवी महिला होने के नाते और बाकी समाज के लोग ,इस बारे में सोचना जरूर।
जो पहले से ही तनाव में थी क्या इस घटना के बाद उसका मानसिक तनाव कम हो गया होगा ? अब उसके बचे हुए एकमात्र बेटे को अपनी मां से डर नहीं लगेगा ? क्या वह कभी उसे एक ममतामयी मां के रूप में देख पाएगा? उसे कभी मां कह पाएगा? जब भी वह अपने भाई बहनों को याद करेगा सबसे पहले उसे हत्यारे के रूप में कौन दिखाई देगा ? क्या मां को देखने के बाद वह डर के मारे सहम नहीं जाएगा?
अब देखते हैं इस घटना की जिम्मेदारी कौन -कौन ले सकता है ।
एक पति होने के नाते क्या अपनी पत्नी की इस मनोदशा का वह उतना ही जिम्मेदार नहीं है ? जितना कि उसकी पत्नी जिम्मेदार है? भले ही उसने अपने 4 मासूमों को मारा हो लेकिन परिस्थितियां क्या बनी ,कैसे बनी, जिससे उसको इस हद तक जाना पड़ा। बार-बार गर्भवती कर के उसकी सेहत को इस हद तक ले जाने के लिए आखिर जिम्मेदार कौन है ? क्या पति इसके लिए कदापि जिम्मेदार नहीं? अपनी आमदनी, अपनी हैसियत देखकर बच्चे पैदा करना और उनका पालन पोषण करने का काम पति का था तो फिर इन सब के पीछे पति की जिम्मेदारी कहां तक बनती है ?
घर में बड़े बुजुर्ग के नाते ससुर का होना और अपने बेटे को अपनी हैसियत के हिसाब से घर में बच्चों की संख्या सीमित रखने के लिए , घर की परिस्थिति के अनुसार चलने के लिए पुत्र को ना समझाना, इस के लिए क्या पिता जिम्मेदार नहीं है ? पिता होने के नाते अपने बेटे को समझाना, उसकी भलाई- बुराई का उसे ज्ञान देना, बहू का ख्याल रखना , पोते -पोतियों के लिए उसकी जिम्मेदारी क्या है? इन सभी का विश्लेषण नहीं किया जाना चाहिए?
अब भविष्य की सोचते हैं ।
उस औरत पर क्या बीत रही होगी? जिसने अपने 4 मासूमों को मौत के घाट उतार दिया और खुद बच गई । अब उसकी मानसिक स्थिति कैसी रहेगी ?उसकी आगे की जिंदगी कैसे रहेगी? उस औरत के पति की क्या स्थिति होगी?
जो घर बच्चों की किलकारीयों से गूंज उठता था वहां अब सन्नाटा है ।क्या वह उस औरत को एक पत्नी के रूप में कभी अपना पाएगा? क्या उस औरत में उसके 4 मासूमों की हत्यारिन नजर नहीं आएगी ?
उस इकलौते किस्मत से बचे हुए हैं बच्चे पर क्या गुजर रही होगी? चार भाई-बहनों को खोकर जिंदगी भर अकेला रहने का दुख ।बचपन से मन में बसा हुआ डर की कोई मुझे मार ना दे? मां को देखते ही आंखों में नजर आने वाला खौफ ।एक ममतामयी मां की छवि उसके दिल में कभी बन पाएगी ? उसकी मानसिक स्थिति का अंदाजा क्या आप और हम लगा पाएंगे? क्या वह कभी चैन की नींद सो पाएगा?
अपने बुढ़ापे में बिखरा हुआ परिवार और 4 पोते- पोतियों को खोने के बाद स्वयं के जिंदा रहने का अफसोस एक दादा को नहीं होगा ? अपनी तोतली जुबान से दादा -दादा सुनने वाले को उस घर में कभी वह आवाज दोबारा सुनाई देगी?
एक चाचा जिसका इस घटना से कोई डायरेक्ट संबंध नहीं, उसे भी अपने प्यारे- प्यारे भतीजे भतीजी को खोकर कितना दुख हुआ होगा ? उसके लिए वह अपनी भाभी को जिम्मेदार नहीं मान रहा? क्या वह कभी अपनी भाभी को “भाभी “कह पाएगा? क्या इसके लिए वह अपने भाई को जिम्मेदार नहीं ठहरा रहा?
समाज , समाज का क्या? दो दिन बढ़-‘चढ़ कर ,दुख जताकर इस न्यूज़ पर चर्चा करेंगे , थोड़ी सी हमदर्दी जतायेंगे, एक दूसरे पर टिप्पणी करेंगे, अपने आप ही सजा सुनाएंगे और कानून पर राय देंगे। सरकार को गरीबी के लिए कोसेंगे, और 4 दिन बाद सब भूल कर अपनी दुनिया में मस्त हो जाएंगे ।
अब कानून क्या कहेगा ऐसी घटनाओं पर? 4 बच्चों की हत्या के लिए किसे जिम्मेदार ठहराया जाएगा, उस औरत को, उस औरत को ऐसा कदम उठाने के लिए और ऐसी परिस्थिति निर्माण करने के लिए जिम्मेदार व्यक्तियों को, उसके पति को, उनकी गरीबी को, सरकार को, समाज को, किसको ?
सोचने वाली बात यह है कि ऐसी घटनाओं का विश्लेषण हो। चुनाव में हार जाने पर पार्टी हार के कारणों का विश्लेषण करती है और उन कारणों का निराकरण करने की कोशिश करती है , वैसे ही ऐसी घटनाओं का विश्लेषण हो और उन कारणों का निराकरण करने की पुरजोर कोशिश हो।
संसद में ऐसे मुद्दे उठे। जनता के प्रतिनिधि इन मुद्दों पर सकारात्मक चर्चा करें। एक दूसरे पर दोषारोपण करके संसद का समय बर्बाद ना करते हुए अपनी जनता के लिए, अपने समाज के लिए , कुछ अच्छा करने के लिए कायदे कानून बनाए । भविष्य के लिए कुछ ऐसी योजनाएं बनाएं जिससे ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति ना हो ।
यह एक घटना नहीं है ।देश में हर रोज ऐसी अनेक घटनाएं घटित होती है। जिसके लिए जिम्मेदारी इसी देश को लेनी है। इस देश का नागरिक होने के नाते ,उसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी सरकारों की बनती है। आप सभी भी
यह मेरे घर की घटना नहीं है यह सोचकर चुप ना बैठै।
जगाईयें – इस समाज को, इस जनता को, इन सरकारों को, जो अपने देश के बच्चों की रक्षा के बारे में सोचें । आए दिन होने वाली इन हत्याओं, आत्महत्याओं पर वाकई बहुत कुछ काम होना बाकी है । देश के भविष्य को भगवान भरोसे ना छोड़े ।संसद में ऐसे विषयों पर खुलकर चर्चा हो, समाज सेवी संगठन आगे आए, सरकार से सवाल पूछे , नेताओं को अपनी जिम्मेदारी का एहसास दिलाए , समाज को जागृत करें और देश का हर नागरिक सुरक्षित और स्वस्थ कैसे रहें इस पर काम करें।
लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहने वाले मीडिया वालों को सिर्फ यह खबर छाप कर अपना कर्तव्य पूरा नहीं करना चाहिए ।उन्हें भी ऐसी घटनाओं के तह तक जाने की जरूरत है, उनके कारणों का विश्लेषण करके समाज की इस बुराई को खत्म करने के लिए कुछ कदम उन्हें भी उठाना जरूरी है। फिर चाहे भले ही वह अपनी लेखनी से क्यों ना हो।
धन्यवाद ।
डॉ मंजू राठी
एमबीबीएस ,एमडी
एलएलबी, एलएलएम
समाजसेविका, ब्लॉगर एवं लेखिका।
उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 “डॉक्टर दुविधा में”
उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 “डॉक्टर दुविधा में”
उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019
“डॉक्टर दुविधा में”
क्यों?
क्योंकि डॉक्टर इस सवाल पर भ्रमित हैं कि “क्या स्वास्थ्य सेवाएं उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के दायरे में हैं,
इस प्रश्न का विश्लेषण करने से पहले हम सभी को इसका इतिहास जान लेना चाहिए।
1.सीपीए, 1986,- 24 दिसंबर, 1986 को अधिनियमित किया गया था और 15 अप्रैल, 1987 को लागू किया गया था।
2.वर्ष 1991, 1993, 2002 आदि में सीपीए में कई संशोधन किए गए।
- अब सीपीए 1986 को निरस्त कर दिया गया है और नए सीपीए अधिनियम, 2019 द्वारा प्रतिस्थापित किया गया है।
- सीपीए 2019, 9 अगस्त, 2019 को राजपत्र में अधिसूचित किया गया था।
- सीपीए नियम, 2020 को 15 जुलाई, 2020 को राजपत्र में अधिसूचित किया गया है।
- सीपीए नियमों को 20 जुलाई, 2020 से लागू करने की घोषणा की गई थी।
अब सवाल आता है कि क्या स्वास्थ्य सेवाएं सीपीए, 2019 के दायरे में हैं?
इस विचारों के दो स्कूल हैं।
पहला स्कूल कहता हैं
“हाँ”
स्वास्थ्य सेवाएं उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 2019 में आती हैं और यह नया अधिनियम पुराने की तुलना में अधिक कठोर है।
इस विचार का समर्थन करने के कारण क्या क्या है।
- सीपीए, 1986 में “हेल्थकेयर” शब्द नहीं है।
- लेकिन “आईएमए बनाम वी पी शांता 1995” मामले पर तीन न्यायाधीशों की पीठ द्वारा माननीय सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद स्वास्थ्य सेवा उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के दायरे में आ गई।
जिसमें “सेवा” की व्याख्या इस प्रकार की गई है कि चिकित्सा पेशे को उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 के दायरे में लाया गया। शुल्क के साथ प्रदान की जाने वाली चिकित्सा सेवा इसमें शामिल है। अदालत ने कहा कि भले ही चिकित्सकों द्वारा प्रदान की जाने वाली सेवाएं व्यक्तिगत प्रकृति की हैं, उन्हें व्यक्तिगत सेवा के अनुबंध के रूप में नहीं माना जा सकता है (जिसे उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम से बाहर रखा गया है)। वे सेवा के लिए अनुबंध हैं जिसके तहत उपभोक्ता संरक्षण अदालतों में एक डॉक्टर पर भी मुकदमा चलाया जा सकता है।
और तब से, रोगी उपभोक्ता बन गया और डॉक्टर को सेवा प्रदाता के रूप में माना गया और उपभोक्ता अदालतों में डॉक्टरों पर मुकदमे चलाए गए। इस प्रकार, उसी तरह,
“स्वास्थ्य सेवा ” शब्द भी इस नए अधिनियम में नहीं है, लेकिन सेवा के खंड में कोई बदलाव नहीं है और इस नए अधिनियम में कई अन्य खंड भी जोड़े गए हैं जो अप्रत्यक्ष रूप से सीपीए 2019 में चिकित्सा पेशे को शामिल करते हैं और न्यायपालिका इस अधिनियम की व्याख्या उसी में कर सकती है। जिस तरह से 1995 के आईएमए बनाम वीपी शांता मामले में व्याख्या की गई है और जब तक आईएमए बनाम वीपी शांता के फैसले को सुप्रीम कोर्ट की बड़ी बेंच द्वारा खारिज नहीं किया जाता है तब तक कोई राहत नहीं है, तब तक डॉक्टरों को इस नए अधिनियम द्वारा शासित किया जा सकता है जो पुराने सीपीए से अधिक कठोर है।
अब, विचार का दूसरा विद्यालय कहता है,
“नहीं।”
सीपीए, 2019 में “स्वास्थ्य सेवा” शामिल नहीं है।
इस विचार के पीछे के कारण निम्न प्रकार है:
(1) भारत का संविधान हमारे देश का सर्वोच्च कानून है हमारे संविधान के अनुसार शक्तियों का पृथक्करण है जहाँ
लेजिस्लेटर्स अधिनियमों को अधिनियमित करते हैं।
एजुकेटिव नियमों को लागू करते हैं
और
न्यायपालिका इन नियमों की व्याख्या करती है।
इन तीन स्तम्भों में शक्तियाँ विभक्त हैं। उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 भारत की संसद का एक अधिनियम है। यह उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 को निरस्त और प्रतिस्थापित करता है। चूंकि यह नया अधिनियम है और संशोधन नहीं है, इसलिए संसद के इरादे की जांच करके न्यायपालिका द्वारा इसकी नए सिरे से व्याख्या की जानी चाहिए।
इस नए अधिनियम को लागू करने के पीछे की मंशा क्या है।
(2) उपभोक्ता संरक्षण विधेयक, 2019 को लोकसभा में पेश किया गया
8 जुलाई 2019 को , उपभोक्ता मामले, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्री श्री रामविलास पासवान द्वारा ।
इसे लोकसभा द्वारा 30 जुलाई 2019 को स्वास्थ्य सेवा को शामिल करने के मुद्दे पर उच्च विवाद के साथ पारित किया गया था।
सीपीए विधेयक, 2018 की धारा 2(42) में “टेलीकॉम” शब्द के बाद “हेल्थकेयर” शब्द था, जिसे लोक सभा में पारित किया गया था।
उसके बाद 6 अगस्त 2019 को राज्यसभा में जो बिल पास हुआ, जिसमें “हेल्थ केयर “यह शब्द सेक्शन 2 (42) में नहीं था।
स्वास्थ्य सेवा को हटाने के बारे में मंत्री श्री रामविलास पासवान द्वारा बताया गया कारण यह है कि कई संसद सदस्य इस विधेयक में स्वास्थ्य सेवाएं नहीं चाहते हैं। इसके पीछे कारण यह है कि यदि डॉक्टरों को सीपीए में शामिल किया जाता है तो वे सीपीए के डर से अधिक रक्षात्मक हो जाते हैं और उन्होंने सिरदर्द और खांसी का उदाहरण दिया।
यदि रोगी साधारण शिकायत के लिए डॉक्टर के पास जाता है और सीपीए के डर से, डॉक्टर एक साधारण दर्द निवारक दवा लिखने से पहले कई जांच की सलाह दे सकता है और इलाज में देरी हो जाती है और इलाज महंगा भी हो जाता है, इसलिए स्वास्थ्य सेवाएं को नए विधेयक से हटा दिया गया है।
और बिल को 9 अगस्त 2019 को राष्ट्रपति श्री राम नाथ कोविंद से स्वीकृति मिली और उसी तारीख को भारत के राजपत्र में अधिसूचित किया गया।
यह सभी घटनाक्रम यह साबित करता है कि संसद का इरादा स्वास्थ्य सेवाओं को सीपीए के दायरे से बाहर रखना है।
3) कई प्रमुख उपभोक्ता अधिकार निकाय जो उपभोक्ता के हितों से निपट रहे हैं, इस बिल से स्वास्थ्य सेवा शब्द को हटाने के बाद चिंतित हैं और वे इसका विरोध कर रहे हैं, यह भी समर्थन करता है कि स्वास्थ्य सेवा सीपीए 2019 से बाहर है।
इस विश्लेषण को समाप्त करने के लिए, मैं कहना चाहूंगी, यदि अदालतें चिकित्सा पेशेवरों के खिलाफ सीपीए के अंतर्गत मामले दर्ज करना जारी रखती हैं , तो सवाल यह है कि क्या डॉक्टर इसे चुनौती दे सकते हैं?
मैं कहना चाहती हूं,
डॉक्टरों का भाग्य “माय लॉर्ड ” के हाथों में है, वे इस नए अधिनियम की व्याख्या कैसे करते हैं, क्योंकि लेजिस्लेटर्स ने अपना स्पष्ट इरादा दिखाया है और अब यह काम है न्यायपालिका का की वह संवैधानिक रूप से इसकी व्याख्या करें।
अब सिर्फ और सिर्फ “डॉक्टरों की एकता” ही आज डॉक्टरों को सी.पी.ए से बाहर रखने में मदद करेगी।अगर डॉक्टर एकजुट रहेंगे तो कोई भी ऐसी अदालत नहीं है जो संसद में पास किए हुए बिल की मंशा को जाने बिना अपनी मर्जी से किसी नियम को लागू कर सके।
धन्यवाद ।
डॉ मंजू राठी
एमबीबीएस .एमडी .
एलएलबी . एलएलएम
RIGHT TO HEALTH BILL(RAJ) स्वास्थ्य का अधिकार- समीक्षा
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यू एच ओ ) के अनुसार स्वास्थ्य की परिभाषा यह है कि,” दैहिक (शारीरिक ) , मानसिक और सामाजिक रुप से पूर्णता स्वस्थ होना( समस्या विहीन होना ) ही स्वास्थ्य है।”
मतलब किसी व्यक्ति की शारीरिक , मानसिक और सामाजिक रूप से अच्छे होने की स्थिति को स्वास्थ्य कहते हैं ।अगर स्वास्थ्य इसे कहते हैं तो फिर स्वास्थ्य का अधिकार (राइट टू हेल्थ ) बिल भी इन सभी स्वास्थ्य का विचार करके ही लाया गया होगा ? अगर सरकार स्वास्थ्य की परिभाषा सिर्फ शारीरिक स्वास्थ्य को देखकर कर रही है तो वह सरासर गलत है। सरकार की मंशा है कि वह ऐसे कानून बना दें जिससे सरकारी तंत्र मजबूत होता दिखता हो, सरकार की ताकत में इजाफा हो और सरकारी खर्च ना हो । जिसके लिए यह बिल लाया जा रहा है उस जनता को तो पता ही नहीं कि इस बिल में क्या है , उसे इस बिल से कोई मतलब नहीं है क्योंकि वह तो जानती भी नहीं कि यह बिल है क्या बला! यह बिल तो सरकार के लिए लाया जा रहा है जिससे सरकारे सोचती है कि उनका वोट बैंक मजबूत होगा पर ऐसा कुछ होने वाला नहीं है , यह उनकी गलतफहमी है। इस बिल से जनता को सब्जबाग दिखाए गए हैं लेकिन यह बिल असलियत से कोसों दूर है और उसके आगामी परिणामों का तो पता ही नहीं है।
ऐसे बिना सोच विचार करें लाऐ हुए इस बिल से सरकार समझती है, जनता का फायदा हो जाएगा और उन्हें सस्ती पब्लिसिटी मिल जाएगी। और शायद, जनता भी यही समझती है यह बिल उनके लिए बहुत ही फायदेमंद होगा, इसमें मुफ्त का इलाज होगा, इमरजेंसी में आप किसी भी अस्पताल में जाकर सेवाएं ले सकते हैं वह भी बिना भुगतान किए वगैरह वगैरह। लेकिन जरूरी नहीं कि हर मुफ्त की चीज अच्छी हो। और आप सभी जानते हैं मुफ्त की चीज की कोई कीमत नहीं होती और कोई उसकी कदर नहीं करता।
जागो, जनता जागो !
इस बिल को समझो। इसके आने से आप की स्थिति क्या होगी इस पर भी जरा सा गौर करना । यह नहीं कि मुफ्त की रेवड़ियां आपको अच्छी लगने लगे और आप यह सोचना भूल जाए कि आपकी जिंदगी की कीमत अनमोल है और यह मुफ्त की रेवड़ियां उसकी भरपाई नहीं कर सकती। आपकी जिंदगी कहीं अधिक कीमती है। इन मुफ्त की रेवड़ीओं से कहीं आप लालच में न आ जाए और अपनी जिंदगी को दांव पर ना लगा बैठे।
आप कहेंगे ऐसा क्या है इस बिल में जो सरकार हमारी भलाई के लिए लेकर आ रही है और डॉक्टर कह रहे हैं कि बिल आपकी भलाई के लिए नहीं है। जनता , आपने कभी इस बिल को पढा़ है ? इसके आगामी परिणामों के बारे में कभी सोचा है? शायद नहीं , तो अब वक्त आ गया है इसे समझने का।
आप सोचते होंगे कि बिल आपके लिए तो बहुत अच्छा है इमरजेंसी में डॉक्टर के पास जाओ , दिखाओ, इलाज कराओ और बिना पैसे दिए ही वापस आ जाओ।
यह अच्छा है क्योंकि इमरजेंसी में आप किसी भी अस्पताल में जाकर अपना इलाज करवा सकते हैं लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि आप इमरजेंसी में इलाज कराने के बाद हॉस्पिटल का बिल अदा ना करके सीधे चले जाए । अगर ऐसा हर कोई करने लग गया तो उसका परिणाम क्या होगा सोचा है कभी आपने?
इमरजेंसी का मतलब क्या है यह इस बिल में कहीं पर भी नहीं लिखा गया है । किसी के लिए कान में दर्द इमरजेंसी है, किसी के लिए पेट में दर्द इमरजेंसी है, किसी के लिए बुखार इमरजेंसी है , तो आखिर में इमरजेंसी की परिभाषा क्या है ? इस बिल में कहीं पर भी इमरजेंसी की कोई परिभाषा नहीं की गई है और इमरजेंसी में इलाज कहां तक किया जाए इसकी भी कोई गाइडलाइन नहीं है। ऐसे में अगर मरीज का 100-200 रु में इलाज हो जाता है तो शायद डॉक्टर यह इलाज फ्री में भी कर दें ।लेकिन अगर किसी मरीज का हजारों में बिल बनता है और वह मरीज इमरजेंसी में मुफ्त में इलाज करवा कर बिना पेमेंट के अस्पताल से रुखसत हो जाता है तो आप जानते हैं इसका परिणाम क्या होगा? अगर दूसरा कोई मरीज इमरजेंसी में आता है और डॉक्टर से इलाज की उम्मीद रखता है तो क्या डॉक्टर उसे इसी तरह इलाज दे पाएगा? ऐसे में क्या होगा ? मानो, कोई मरीज छाती में दर्द करके आता है, ऐसे में डॉक्टर उसे एक डिस्प्रिन की गोली देकर आगे रेफर कर देगा और जो वह इलाज का गोल्डन वक्त होता है उस वक्त में अगर मरीज को सही तरीके से इलाज नहीं मिला और वह एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल में और अंत में सरकारी अस्पताल के लिए भटकता रहा तो उसका क्या अंजाम होगा कभी सोचा है किसी ने?
जरा सोचना!
डॉक्टर को कुछ नहीं मिलता मुफ्त में। अपने बच्चों की पढ़ाई के लिए, अपना घर चलाने के लिए, अस्पताल का खर्चा उठाने के लिए ,दवाइयों का खर्चा उठाने के लिए ,अपने स्टाफ का खर्चा उठाने के लिए , अपना लोन चुकाने के लिए उसको दिन रात मेहनत करनी पड़ती है और ऐसे में हर मरीज अगर इमरजेंसी करके आ गया और बिना भुगतान करें हॉस्पिटल से निकल गया तो इसके दूरगामी परिणामों की व्याख्या करने कि शायद मुझे जरूरत नहीं है ।
इमरजेंसी के नाम पर दिए गए इलाज का भुगतान कौन करेगा इसका स्पष्ट प्रावधान इस बिल में होना चाहिए और वह कितने वक्त में होगा । यह भुगतान सरकार करेगी ,इंश्योरेंस कंपनी करेगी या कोई और करेगा और वह सालों में नहीं चंद घंटों में होना चाहिए। जैसे इमरजेंसी में चंद घंटों में इलाज दिया जाता है उसी तर्ज पर भुगतान भी चंद घंटों में हो जाना चाहिए।
क्या कभी होटल वाला फ्री में खाना देता है? ऐसा होता तो आज लाखों लोग भूखे नहीं सोते ।अगर जनता के लिए इलाज जितना जरूरी है उससे कहीं गुना ज्यादा उसको खाना मिलना जरूरी है , स्वच्छ पानी मिलना जरूरी है ।बिजली मिलना उतनी ही जरूरी है ।
क्या सरकार यह चीजें उपलब्ध करवा पा रही है ? अगर यह कर पा रही है तो फिर राइट टू हेल्थ का बिल भी उसी तरह से बनना चाहिए जिस तरह से यह बाकी चीजें सरकार जनता को दे रही है। उसके लिए आप सोसाइटी के एक तमगे के लिए कोई कानून कैसे बना सकते हो? जब आप किसी दूसरे धंधे के लिए उनकी कीमतों पर अंकुश नहीं लगा सकते और जब हॉस्पिटल को व्यवसाय के रूप में ही माना गया है तो फिर आप डॉक्टर के रूप में अस्पताल का व्यवसाय करने वाले डॉक्टरों की फीस और अस्पताल की कीमतों पर कैसे अंकुश लगा सकते हो? जरा सोचना।
अगर आपका मकसद सिर्फ कानून बनाना ही है तो फिर जिस कानून में सबसे ज्यादा स्टेकहोल्डर जो कि एक डॉक्टर है उस में भी सबसे ज्यादा प्राइवेट अस्पतालों का इसमें समावेश है ,तो उन प्राइवेट अस्पतालों के एसोसिएशन के डॉक्टरों की राय नहीं लेनी चाहिए थी?
इस बिल में मरीजों के अधिकार तो दिये हैं वैसे डॉक्टरों के अधिकार क्यों नहीं दिए गए हैं?
जरा सोचो,
डॉक्टरों के और अस्पतालों के अधिकार क्यों नहीं होने चाहिए?क्या उन्हें अपने अधिकार मांगने का हक नहीं है? क्या वो समाज का हिस्सा नहीं है? क्या वे इस स्टेट का हिस्सा नहीं है? “राइट टू लाइफ ” का अधिकार तो डॉक्टर को भी है ।
क्या सरकार प्राइवेट हॉस्पिटल मैं होने वाला खर्चा जैसे कि बिल्डिंग का खर्चा ,दवाइयों का खर्चा, स्टाफ की सैलरी , बिजली का बिल स्वयं उठाती है जैसे वह सरकारी अस्पताल में उठाती है ?
अगर वह सरकारी अस्पतालों की तर्ज पर यह सारी सुविधाएं प्राइवेट अस्पतालों में नहीं दे सकती है तो फिर उन्हें प्राइवेट अस्पतालों से मुफ्त इलाज करने की उम्मीद भी नहीं रखनी चाहिए ।
ऐसे में यह राइट टू हेल्थ बिल सिर्फ सरकारी अस्पतालों के लिए बनना चाहिए फिर वह प्राइवेट अस्पतालों के ऊपर क्यों थोप रही है?
इस बिल में क्या है।
आप यह नहीं जानते इसमें जनता के अधिकार दिए हुए हैं, सरकार ने अपने पास सारे अधिकार रख लिए हैं। और जो इन सेवाओं को देगा – डॉक्टर और हॉस्पिटल उनका तो उसमें उल्लेख तक नहीं है ।उन्हें क्या चाहिए ,उनके लिए क्या ठीक है, उन्हें क्या परेशानी है, उनकी तकलीफ कौन सुनेगा, उनका निस्तारण कैसे होगा, उनकी सेवाओं के लिए भुगतान कौन करेगा ,उनके खिलाफ होने वाली शिकायतों को कौन सुनेगा ।
हां,सरकार ने शिकायत निवारण कमेटी का गठन करने का प्रावधान तो किया है लेकिन उसमें क्या कमियां है इसे आप समझ पाएंगे?
शिकायत निवारण कमेटी के गठन में अगर डॉक्टर नहीं होगा तो कोई अधिकारी डॉक्टर की समस्या को अच्छी तरह से समझ पाएगा?
क्या सरकार प्राइवेट अस्पतालों पर अफसर शाही का दबदबा बनाना चाहती है ? अफसर अपनी मर्जी से किसी भी डॉक्टर या अस्पताल के विरुद्ध कार्रवाई करें पर अफसरों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं कर सकता। अफसरों को मनमानी शक्तियां देकर उन्हें डॉक्टरों पर बेमतलब का अंकुश लगाने की चाबी दे दी है।किसी भी अस्पताल में कभी भी घुसकर कुछ भी डॉक्यूमेंट मांगना और ऊपर से कोई भी नोटिस थमा देना या अगर कोई शिकायतकर्ता है तो उस शिकायत का अपने स्तर पर निवारण करना और डॉक्टरों को वह निर्णय मान्य करने के लिए बाध्य करना, क्योंकि डॉक्टरों को इसके लिए कोर्ट में शिकायत करने का कोई अधिकार नहीं है ।क्या इन सभी बातों से होने वाले नुकसान का कभी किसी ने आकलन किया? क्या ऐसे प्रावधानों से डॉक्टरों के मूलभूत हक्कों का हनन नहीं हो रहा है?
आज के इस स्वतंत्र देश में अगर इस तरह अफसरशाही हावी हो गई तो इस स्वतंत्रता का क्या लाभ ?;फिर तो अंग्रेजी हुकूमत से हमने लोहा क्यों लिया? इस दिन के लिए ? अपनी राजनीति करने के लिए डॉक्टरों की परेशानियों को नजरअंदाज करना, जो इस बिल का महत्वपूर्ण हिस्सा है ,क्या यह जायज है? कभी सोचा है आपने, इस तरह के निर्णय से डॉक्टरों के मूलभूत अधिकारों का हनन नहीं होगा ? क्या अधिकारियों का लिया हुआ निर्णय सर्वोपरि सर्वमान्य होना चाहिए?
डॉक्टरों को राइट टू लाइफ यानी जीने का अधिकार नहीं है। राजनीति करने वाले सही कहते हैं , “डॉक्टरों को कमाना नहीं चाहिए, उन्हें तो सिर्फ सेवा करनी चाहिए ।” जैसे कि उनके परिवारों को सरकार पालती हो?
आप ही बताइए-
क्या डॉक्टर को मुफ्त में इलाज करना चाहिए और अपने परिवार की और अपनी सारी जिम्मेदारियां सरकार पर छोड़ देनी चाहिए? क्या सरकार उन सभी डॉक्टरों की जिम्मेदारियां उठा पाएगी?
जागो जनता जागो।
जागो सरकारों, जाग जागो।
जनता अभी भी वक्त है जाग जाइए । जो “मुफ्त इलाज ” के सब्जबाग आप देख रहे हैं वह कहीं बुरा सपना बनकर ना रह जाए। कहीं ऐसा ना हो प्राइवेट डॉक्टर हर एक फ्री की इमरजेंसी को रेफर करने पर मजबूर ना हो जाए और जो इलाज आसानी से और सही वक्त पर हो सकता था उससे आप दूर ना हो जाओ और इससे आपको कहीं नुकसान ना भुगतना पड़े। इमरजेंसी में वक्त पर इलाज नहीं मिलने पर परिणाम क्या होगा यह किसी को बताने की जरूरत नहीं होगी ।दूर की सोच है पर बहुत सही है।
डॉक्टरों की फीस सरकारे तय करेगी जैसे आज तक दाल, चावल, दूध और खाने की चीजें या किसी और धंधे की कीमतें तय करती आई हो ? कभी वकील ,आर्किटेक्ट ,इंजीनियर की फीस तय की है? क्या खाना, अच्छी सड़कें , शुद्ध पानी , बिजली इत्यादि जनता के मूलभूत अधिकार नहीं है ? क्या इन पर कभी यह लोग जो जनता के प्रतिनिधि है कभी रोक लगा पाएंगे ? इन चीजों को फ्री में बांट पाएंगे? टोल टैक्स की छुट्टी, बिजली का बिल, पानी का बिल, होटल में खाना सरकारे मुफ्त में दे पाएगी ?
सरकारें जनता के प्रतिनिधियों से बनती हैं लेकिन जनता कौन है ? डॉक्टर तो किसी जनता की सूची में आते ही नहीं , क्योंकि वह ना तो किसी की वोट बैंक है , ना ही उसे राजनीति में कोई रुचि है , वह तो ” बंधुआ मजदूर” है जिसका अपना कोई अधिकार नहीं होता।
यह बिल सस्ती लोकप्रियता पाने के लिए ,जनता की सहानुभूति पाने के लिए लाया जा रहा है ।जिससे जनता की सेहत तो सुधरेगी कि नहीं ,यह नहीं बता सकते , लेकिन सरकार की सेहत जरूर सुधर जाएगी।
क्योंकि वह सोच रही है की इस बिल के लाने से उनका वोट बैंक में इजाफा जरूर होगा और आगे आने वाले चुनाव में इस बिल को कैश करने का वक्त आ जाएगा।
जागो ,जनता जागो ।
कम से कम अपनी परवाह तो करो और अपना भला-बुरा खुद समझो। कहीं ऐसा ना हो वक्त बेवक्त आप किसी प्राइवेट अस्पताल में आए और आपको वहां ताला मिले।
डॉ.मंजू राठी
एमबीबीएस. एमडी.
एलएलबी . एल एल एम.
राइटर, ब्लॉगर और समाज सेविका।
आसमां

मैं और मेरी तन्हाई अक्सर यह बातें करते हैं ,
ऐसा होता तो क्या होता ?
वैसा होता तो क्या होता है?
पर ऐसा कुछ भी तो नहीं हुआ ,जो हुआ वह मैंने कभी सोचा भी नहीं था। बचपन में आसमां में उड़ते पंछियों को देखकर सोचा करती थी कि मैं भी उडूंगी ,मुझे भी उड़ना है। मुझे भी आसमां छूना है , और अब——।
मुस्कान सोच रही थी। खिड़की में बैठी आसमां में स्वच्छंद विचरण करने वाले पंछियों को देख कर उसे अपना बचपन याद आ गया, बचपन में देखा वह सपना याद आ गया। पर अब वह बचपन कहां है ? बचपन का वह सपना कहां खो गया ? क्या ! सब कुछ यही होना था तो फिर वह सपना क्या था ? क्यों इंसान सपने देखता है , जिसके पूरा होने का दूर-दूर तक कोई नामोनिशान नहीं होता , ऐसा सपना वह देखता ही क्यों है ? अगर मेरे सपनों का यही हश्र होना था तो मैंने वह सपने देखे ही क्यों? क्यों मैं उस दुनिया में जीती रही जो मेरी कभी होनी ही नहीं थी ।सपनों की दुनिया और असल दुनिया का अगर कोई कोई संबंध नहीं तो फिर यह लोग क्यों कहते हैं , ” सपने देखो, सपने देखना अच्छा होता है ,सपनों से आसमां छू सकते हैं , वगैरह वगैरह। मैं तो आसमां क्या मेरी घर की छत भी नहीं छु सकती।
आज मैं पच्चीस साल की हूं और मेरी जिंदगी क्या है यह जानना नहीं जाओगे आप ?
बचपन की ” मुस्कान ” , जिसका नाम मुस्कान, जो सिर्फ मुस्कुराना जानती थी, जो सबको मुस्कुराना सिखाती थी, उसकी मुस्कान आज कहां खो गई? क्या वह मुस्कान वापस लौटेगी? क्या मुस्कान कभी उस सपनों की दुनिया में सैर करेगी? शायद नहीं, कभी भी नहीं । क्योंकि मुस्कान की जिंदगी बदल चुकी है, मुस्कान बदल चुकी है , वह मुस्कान कहीं खो चुकी है।
मुस्कान खुश थी। मुस्कान स्कूल जाती थी । मम्मी पापा बहुत प्यार करते थे उसे । घर में सबसे छोटी जो थी , सबकी लाडली थी। चार भाई बहनों में सबसे छोटी। बड़ी बहन , फिर दो भाई और फिर मुस्कान । सभी पढ़ते थे, पापा कोशिश करते थे कि सबको अच्छी पढ़ाई करा कर एक अच्छी जिंदगी दे। उनकी सोच अच्छी थी पर शायद मुस्कान की तकदीर अच्छी नहीं थी।
बड़ी बहन की पढ़ाई पूरी होते ही उसके लिए रिश्ते आ गए । अच्छा लड़का, अच्छा घर था । पापा को लड़का पसंद आ गया। बहन भी राजी थी। सब कुछ ठीक था पर मुस्कान की तकदीर खराब थी। उनकी शर्त बड़ी अजीब थी , उनके बड़े बेटे जिसके साथ बड़ी बहन का विवाह होना था उसका छोटा भाई भी था और उसकी शादी भी वह साथ ही करना चाहते थे। उनकी नजर मुझ पर पड़ी और उन्होंने मेरा हाथ मांग लिया। मैं सिर्फ 19 साल की थी तब । पापा शुरू में तो मना करते रहे,” बेटी छोटी है , उसकी पढ़ाई बाकी है” , पर पता नहीं उन्होंने मम्मी पापा को कैसे मना लिया। पापा बिचारे मिडिल क्लास फैमिली के, तो सोचा अच्छा घराना है, लड़का अच्छा है , अच्छी नौकरी है , अच्छी तनख्वाह है। एक साथ दो बेटियों की शादी हो रही है तो खर्चा भी बच जाएगा और शादी भी धूमधाम से हो जाएगी। आज नहीं तो दो-तीन साल बाद शादी करनी ही है तो फिर कर देते हैं शादी अभी , क्योंकि मेरी आगे की पढ़ाई के लिए उन्हें कोई एतराज नहीं था। मेरी राय पूछी तो गई थी पर मैंने मेरे ‘ना ‘ कहने का ज्यादा असर नहीं हुआ और मेरा विवाह हो गया मेरी बहन के साथ साथ। इस घर से मेरा नाता छूट गया या यूं कहो टूट गया। बेटी पराई हो गई। अब बेटी का ससुराल उसका घर यह रूढ़िवादी सोच अब भी कायम है और आगे भी कायम रहेगी, मैं उसमें अपवाद कैसे हो सकती हूं?
शादी के बाद पढ़ाई तो जारी रख रही थी कि पता चला कि मैं गर्भवती हो गई । अब पहला बच्चा था तो सब की खुशी का ठिकाना नहीं था और उनकी खुशी कि खातिर मैंने बीस साल की उम्र में एक बच्चे को बेटे के रूप में जन्म दे दिया । दो बोतल खून भी चढ़ा और मैं इतनी कमजोर हो गई कि बच्चा संभालना और खुद को संभालना मुश्किल हो गया और —- मेरी पढ़ाई बीच में ही छूट गई। मेरा बचपन से संजोया हुआ सपना टूट गया । बच्चा संभालते संभालते मैं कब गृहणी बन गई पता ही नहीं चला । बच्चा दो साल का हुआ ही था कि पता चला मैं दोबारा गर्भवती हो गई और नौ महीने बाद दूसरा बच्चा बेटी के रूप में आ गया। चौबीस साल में दो बच्चों की मां बन गई थी। अब तो मेरी जिंदगी उसी में उलझ गई। मैं एक पत्नी का , एक बहू का , एक मां का किरदार निभाते निभाते कब बड़ी हो गई पता ही नहीं चला । पढ़ाई क्या होती है यह तो मैं भूल ही गई थी । बच्चों को कविता सिखाने और एबीसीडी सिखाने तक मेरी पढ़ाई काम आने लगी। सुकून था कि बच्चों को कुछ तो पढ़ा रही हूं बस इतना सा। पर दिल में एक दर्द हमेशा था , काश यह ना होता, कुछ और होता। मेरी किस्मत कहां आसमां छूना चाहती थी और कहां इस घर गृहस्थी की नैया ढोने में जिंदगी गुजर रही है।
मेरे पति अच्छे हैं , मेरे परिवार वाले मुझे बहुत प्यार करते हैं, मेरे बच्चों से मुझे बहुत प्यार है पर इसके अलावा भी मैं कुछ और करना चाहती थी जो हो न सका। मैं फिर भी पढ़ना चाहती थी पर मेरी किस्मत को कुछ और ही मंजूर था ।अगले दो साल में मेरे साथ और भी बहुत कुछ हो गया। मेरी बहन के बच्चा नहीं हुआ और मुझे नसबंदी करवानी नहीं दी गई ।यह समझो भावनाओं में बहकर मैंने नसबंदी नहीं करवाई। दो बार मेरा गर्भपात हो गया आखिरी बार तो मैं मरते- मरते बची। मैंने मेरा जीवन इसी में झोंक दिया ।
मुस्कान की मुस्कान छीन गई और आज इस खिड़की में बैठी मैं अभी उसी आसमां को निहार रही हूं जिसे मैं बचपन में निहारा करती थी। अचानक से एक काला – सा बादल आया और आसमां की आभा को मिटा गया । अचानक यह आसमां बदल गया । अभी यह आसमां अपनी आभा खो चुका है । अभी इस आसमां में कालीमा है , अब तो वो पंछी भी उठ गए। पर इन बादलों से ढके हुए आसमां से एक उम्मीद की किरण आज भी है कि कहीं ना कहीं यह बादल बरसेंगे और यह आसमां पहले के जैसा साफ दिखाई देगा और मेरी जिंदगी में भी मेरे सपनों की वह किरण दिखाई देगी।
डॉ मंजू राठी
एमबीबीएस एमडी
एल एल बी. एल एल एम
दोस्तों का खजाना

दोस्ती की कलम से – “दो शब्द “
“दोस्त, दोस्ती” ये शब्द हम बचपन से ही सुनते आ रहे हैं पर इन शब्दों का सही मतलब तो जब हम बड़े होते हैं तब समझ में आता है। अंग्रेजी में कहते हैं,
“A Friend in need is friend in dead.”
सच कहते है, जो दुःख में साथ निभाता है वह ही सच्चा मित्र होता है। पर आज दोस्ती की परिभाषा बदल गयी है- कहते हैं, “जो हमेशा साथ निभाता है वही सच्चा दोस्त होता है।”
दोस्तों, बिन दोस्तों के जिन्दगी नीरस होती है। दोस्तरूपी मोती हमेशा माला में होना जरूरी होता है। वरना उस माला का मोल साधारण रह जाता है और जितने ज्यादा यह मोती आपकी माला में होगें उतनी ही यह माला अनमोल होगी और आपका “दोस्तों का खजाना” उतना ही कीमती होगा।
जब हम बच्चें होते हैं तभी हमारे नन्हें-नन्हें दोस्त होते हैं। जब स्कूल में पढ़ने जाते है तब वो दोस्त अलग बन जाते हैं। कुछ तो इतने अंतरंग दोस्त बन जाते है कि जिन्दगीभर साथ रहते है जिन्हें हम “लंगोटिया यार” कहकर पुकारते है। कितना अच्छा लगता है जब ऐसा यार हमारे जिन्दगी के आखिरी पायदान तक हमारे साथ हो तो।
जवानी की दहलीज पर पाँव रखते है तो कॉलेज के दोस्त बन जाते हैं। बहुत खुबसूरत वो कुछ साल होते है जो जिन्दगीभर याद रहते हैं। दोस्तों के साथ घूमना-फिरना, पिक्चर देखना, हँसी-मजाक, लड़ाई-झगड़ा सबकुछ तो चलता है इस उम्र में उम्र का यह दौर ज्यादातर दोस्तों के साथ गुजारा हुआ जिन्दगी का वो खुबसूरत वक्त होता है जिसकी यादें हर इन्सान के जेहन में हमेशा तरोताजा रहती हैं भले ही ये दोस्त कितने ही सालों बाद मिले। उन कॉलेज के दिनों को याद करके हर इन्सान मुस्कुरा ही देता है।।
दोस्तों, उसके बाद शुरू होता है जिन्दगी का वो सफर जहाँ पर आपका हम सफर एक दोस्त बनकर आता है। जिन्दगी की नैया को ढोते ढोते अनेक नये दोस्त जुड़ जाते हैं, करियर के सोपान पर चढ़ते चढ़ते कुछ दोस्त बिछुड़ जाते हैं तो कुछ नये शामिल हो जाते हैं। कभी माँ बाप दोस्त बन जाते हैं, तो कभी भाई-बहिन, पर कोई ना कोई दोस्त जरूर रहता है। उसके बाद आती है वो उम्र जहाँ पर जिम्मेदारियाँ निभाने का वक्त आ जाता है उस वक्त उस उम्र में बच्चों का सफर अलग हो जाता हैं, कई अपने छोड़ जाते हैं तो कई दोस्तों का साथ छूट जाता है पर फिर भी जिन्दगी तो काटनी ही पड़ती है और उस वक्त सबसे ज्यादा जरूरत महसूस होती है वह है दोस्तों की उस वक्त अगर यह दोस्तरूपी खजाना हमारे पास होता है, तो यह जिन्दगी का सफर आसानी से कट जाता है। उसके बाद आते है हम उम्र के उस पड़ाव पर जहाँ पर अपना शरीर साथ छोड़ने लग जाता है, अपना अजीज कहीं और दुनिया में बस जाता है- ऐसे में आने सुख-दुःख का साथी कोई और नहीं— बस वह दोस्त ही होता है जो हमारे साथ चलता है। यह हम दुनियाँ में आते हैं तो हमारे साथ जन्म से अनेक रिश्ते जुड़ जाते हैं और जाते हैं से और रिश्तों को तोड़ देते हैं पर यह दोस्ती का रिश्ता आपके जन्म से लेकर आपके आखिरी सफर तक अलग-अलग रूप में बनता है और आपका जीवन सुन्दर बनाता है।
दोस्तों, जन्म से अंत तक हमें इन दोस्तों की जरूरत होती है और इस वजह से हमारी जिन्दगी को आसान बनाने के लिए इस “दोस्तों का खजाना” को बढ़ाना चाहिए। यह खजान आपकी जिन्दगी की सबसे बड़ी कमाई है। यह रिश्ता आपका अपना है, अपने अंतरात्मा की पुकार से बनाया हुआ यह रिश्ता आपकी आखिरी साँस तक आपके साथ रहता है। आपके अपने आप को छोड़ जाते है पर यह अपना कभी नहीं छोड़ता।
“चाहे कितने भी दूर रहें,
दोस्ती के सिलसिले कभी कम ना होंगे ……
जब भी लगे की तुम तन्हा हो, पलट कर देखना,
तुम्हारे साये की जगह हम होंगे।।”
दोस्तों, यह पुस्तक “दोस्तों का खजाना” भी यही कहती है कि अपनी जिन्दगी सुन्दर बनाने के लिए “दोस्तों की श्रृंखला ” बनाइये। अगर दोस्तों की यह चेन हम बनाते हुये यह खुबसूरत जिन्दगी का सफर तय करेंगे तो जिन्दगी की मुश्किल से मुश्किल घड़ी भी चुटकियों में बीत जायेगी और यह दोस्तों की श्रृंखला इतनी बढ़ जायेगी कि दुश्मन नाम की कोई चीज इस दुनिया में ना रहेगी। दुनिया का नक्शा इस दोस्तरूपी श्रृंखला से कुछ अलग ही बन जायेगा जिसमें राग, द्वेष, घृणा का कोई स्थान नहीं होगा और सारे जहाँ में सुख-चैन, अमन का डंका बजेगा।।
तो दोस्तों, आईये– पढ़िये, यह “दोस्तों का खजाना” और जानिए कि यह दोस्तरूपों मोती हमारी जिन्दगी के साथ-साथ इस समाज में भी किस तरह बदलाव ले आते हैं। अगर हर जगह यह दोस्तों की श्रृंखला तैयार हो गयी तो वो दिन दून नहीं जब इस दुनिया का हर इन्सान खुश होगा।
दोस्तों, इस दोस्तरूपी माला को बढ़ने दीजिए और यह माला इतनी मजबूत बनाईये कि इसमें कोई भी सेंध ना लगा सके। यह अटूट रिश्ता हमेशा संजोए रखिए। इस रिश्ते से हमेशा ‘स्वस्थ रहिए खुश रहिए।”
डॉ. मंजू राठी
एम.बी.बी.एस. एम.डी. एल.एल.बी. एल.एल.एम
Cont. No. 9413042081 ,9079314569
Email:-rathihospitalksg@gmail.com
दोस्तों का खजाना
Happy Doctor’s Day
HAPPY DOCTOR’S DAY 💐💐
HAPPY DOCTOR’S DAY 💐
डॉक्टर तो डॉक्टर है
कभी इंसान था ही नहीं
इंसानों की इस दुनिया में
कभी डॉक्टर था ही नहीं
आओ चले, बीमारी में डॉक्टर के पास
आपके दुख दर्द के लिए करे वह अपनी नींद हराम
बदले में मिले उसे लात घुसे और गाली
फिर भी रहता है खड़ा चट्टान की तरह
रोते रोते भी मुस्कुराता है और
फिर बढ़ जाता है आगे
हिमालय सा बड़ा है दिल उसका
करता है फिक्र सबकी
बहता रहता है गंगा की तरह
मस्ती में अपनी
समेटे पाप आपके अपने दिल में।
निरंतर चलता है भारी दिल से
यूं ही मुस्कुराता हुआ
नमन तुझे डॉक्टर
नमन तेरी डॉक्टरी को
आओ चलें, आगे बढ़े ,
कुछ ना कहे ,
कुछ ना सोचे
तू तो डॉक्टर है
कभी इंसान था ही नहीं
इंसानों की इस दुनिया में
कभी तुम थे ही नहीं
कभी तुम थे ही नहीं
हैप्पी डॉक्टर्स डे।।
HAPPY DOCTOR’S DAY 💐❤️
Dr. Manju Rathi