अलविदा मार्शल
31st October 2023 – 6:08pm
आज मार्शल हम सभी को छोड़कर अपने आखिरी सफर पर रवाना हो गया। कभी सोचा भी नहीं था कि यह सब इतना अचानक हो जाएगा। हमेशा खेलते -कुदते, हमारे पीछे-पीछे दौड़ने वाला यह मार्शल आज अचानक से हमारे से इस तरह जुदा हो जाएगा यह किसी ने भी नहीं सोचा था ।
मार्शल हम सभी का चहेता था ।सिर्फ एक महीने की उम्र में अपने माता-पिता से जुदा होकर मेरे आंगन में आया था। 19 दिसंबर उसका जन्म दिवस पर हमारे यहां वह 24 जनवरी को आया था। यह दिन हम हमेशा उसके जन्मदिवस के रूप में मनाते हैं। 9 साल से वह इस घर में एक राजा की तरह हमारे साथ रहा। वह मेरा शेर था और दिखता भी वैसे ही था। लंबा- चौड़ा,जन्म से माथे पर तिलक लगाए हुए, बिल्कुल एक शेर की तरह था। अगर कोई एक बार देख ले उसे तो डर के अपने पांव पीछे हटा ले। कोई भी अंजान उसके सामने आने की हिम्मत नहीं करता था।
मेरा बेटा हॉस्टल में पढ़ने के लिए चला गया और उसी वर्ष मार्शल का घर में आगमन हो गया। फिर दो-तीन साल बाद बेटी भी हॉस्टल पढ़ने चली गई और फिर मैं, मेरे पति और मार्शल यही सब यहां रह गए। अब तो वह अपने आप को इस घर का बेटा मान कर हमारी सेवा करने लग गया था।
मार्शल इतना चुलबुला ,समझदार और मासूम था कि किसी को भी उस पर प्यार आ जाए ,पर उसे देखते ही अच्छे-अच्छे के पसीने भी छूट जाते थे। एक बार अगर उसने भौंकना शुरू कर दिया तो किसी अनजान की हिम्मत नहीं होती कि उसके सामने आए। उसकी टेरिटरी में एक परिंदा भी पर नहीं मार सकता था ।
हमारी तो हर बात वह समझता था। कोई कुत्ता भी इतना समझदार हो सकता है ? यह देखकर मुझे आश्चर्य होता था। कभी भी उसने किसी को तकलीफ नहीं दी थी। बीमार होने पर भी वह स्वयं कोशिश करता था कि किसी को तकलीफ ना हो ।कभी भी घर में उसने गंदगी नहीं की थी। टाइम पर अपने सारे काम निपटाता था। वक्त का इतना पाबंद तो शायद इंसान भी नहीं हो सकता जितना वह था। वक्त का उसे कैसे पता चलता था कि अभी 5:00 बज गए अभी 7:00 बज गए अभी 6:00 बज गए हैं, बिल्कुल चाहे घड़ी मिला लो, ऐसा पंक्चुअल था।
हमारी कार की आवाज वह पूरी दुनिया में पहचान लेता था। कार का हॉर्न तो दूर सिर्फ कार चलने की आवाज से वह हमारी कार आ गई है और बरामदे में आकर खड़ा हो जाता था ।
अगर कभी नीचे से मेरी आवाज आ गई तो रैम्प में आकर खड़ा हो जाता था ,चाहे फिर आधा घंटा लगे ,चाहे एक घंटा लगे, वह वहीं पर खड़ा रह कर इंतजार करता था, लेकिन कभी दहलीज को पार करके बाहर नहीं आता था। इतना समझदार था वह ।
कभी मैं अकेली जल्दी आ जाती या फिर डॉक्टर साहब जल्दी आ जाते तो वह दूसरे का इंतजार करता था। वह हम दोनों को ही अपना सब कुछ मानता था और इंतजार करते-करते कभी थकता नहीं था। बार बार बुलाने पर भी वह घर के अंदर नहीं आता था जब तक कि हम सभी घर पर ना आ जाए।
रोज उसके साथ खेलना जरूरी था, उसके साथ घूमना जरूरी था,उसके साथ बातें करना जरूरी था और उसके साथ बैठकर टीवी देखना जरूरी था ।जब तक उसके साथ खेल ना लिए या मस्ती ना कर ली तब तक उसे चैन नहीं पड़ता था। वह हमें हंसाता भी था, खिलाता भी था, मस्ती भी कराता था और कभी-कभी गुस्सा भी दिलाता था । लेकिन था वह अपना चुलबुला मार्शल।
कभी अकेले में बोरियत हो जाती तो मस्ती करने के लिए कभी इधर-उधर दौड़ता था और अचानक कोई गमला तोड़ देता था या फिर कभी गमले से मिट्टी निकाल देता था तो चुपचाप कान नीचे करके जमीन पर पसरकर बैठ जाता था ताकि हमारी डांट ना पड़े और अगर डांट पड़ भी जाती तो सिर्फ कान के इशारे से उसका जवाब देता था और यह देखकर हमें हंसी आ जाती थी और हम उसे डांटना हीं भूल जाते थे। ऐसा था यह चालू मार्शल।
उसकी ऐसी हरकतें देखकर हंसी आ जाती थी और गुस्सा गायब हो जाता था। गलती का एहसास उसे हो जाता था और और फिर उसे डांटने का मन भी नहीं करता था ।
मार्शल बचपन में जब अपनी कार में राजा की तरह बैठकर क्लब जाता था खेलने के लिए तो रोड के सारे कुत्ते उसे पहचानने लग गए थे और कभी-कभी तो खाली कार वहां से गुजरती थी तब भी उसमें मार्शल है यह समझकर रोड के कुत्ते अपनी आवाज में,अपनी भाषा में उसे पुकारते थे तो उनकी समझदारी का एहसास होता था। जब यह एक राजा की तरह अपने दोस्तों पर भोंकते हुए अपनी सेंट्रो कार में सफर करता था तो एक महाराज से कम नहीं लगता था।मेरी बेटी ने तो उस
” सेंट्रो ” कार का नाम “मिसेंट्रो “कर दिया था और वह कार सिर्फ मार्शल की थी ।
दिन भर अंदर बाहर ,ऊपर नीचे दौड़ते हुए और परिंदे को उड़ाते हुए उसका दिन कैसे बीत जाता था शायद वह भी नहीं जानता था।
जब बेटा और बेटी हॉस्टल से आते थे तो उसकी खुशी का ठिकाना नहीं रहता था।उनके साथ खेलना, और 24 घंटे उनके पीछे-पीछे दुम हिलाते हुए घूमते देखकर तो हम दोनों यही कहते थे कि यह तो मौका परस्त है और हमें तो भूल ही गया है।
जैसे ही कोई बाहर जाता था या उसकी सूटकेस पैकिंग के लिए उतारता था तो यह महाराज उदास होकर एक कोने में बैठकर टिमटिमाती हुई आंखों से उनकी गतिविधि को देखते रहते थे कि अब उसे कोई छोड़कर जाने वाला है और जब कोई वापस लौट कर आता था तो अपनी भाषा में वह बड़े जोर-जोर से खुशी जाहिर करता था। उसवक्त उसमें जो उत्तेजना दिखती थी उसका कोई ठिकाना न था। उसकी खुशी यही थी कि उसका घर का सदस्य वापस आ गया है।
जब भी बाहर जाते थे और वापस आने पर ताला खोलने पर घर में सबसे पहले एंट्री इन्हीं महाशय की होनी चाहिए यह उसका उसूल था, उसे कोई भी तोड़ नहीं सकता था।
शाम को आने के बाद जैसे कोई बच्चा चॉकलेट के लिए दादा दादी का बक्सा खुलने का इंतजार करता था वैसे वह बिस्कुट के लिए इंतजार करता था और जब तक बिस्किट नहीं मिल जाते तब तक दो पांव पर खड़ा रहता था। ऐसा था यह मासूम मार्शल
सुबह अगर उठने में देरी हो जाती है तो यह बेड के चक्कर लगाते हुए धीमी आवाज में गुर्राते हुए उठाने की कोशिश करता है और अपनी भाषा में कह रहा होता है,”अब उठ भी जाओ ,सुबह हो गई है ,घूमने जाना है।” और स्वयं घूमने जाने के लिए तैयार रहता है। और जब हम घूमने शुरू करते हैं तो हमारे पीछे-पीछे वह अपनी वॉक भी पूरी कर लेता है। ऐसा था यह समझदार मार्शल।
मार्शल महाशय बेटी का तो लाडो था। हॉस्टल से भी जब तक उसका हाल-चाल रोज नहीं जान लेती या कोई वीडियो ना देख लेती तब तक उसे चैन नहीं पड़ता था। हम सभी ने उसके मार्शल नाम के अलावा भी अनेको नाम रखे थे जिन्हें वह बखूबी समझता था जैसे “मिशी,मिशिया,मार्शू, टुटू”। ऐसे नाम उसे अपने है यह वह समझता था और इन्हीं नाम को भी वह उतना ही रिस्पांस देता था जितना की मार्शल को।
पिछले 9 साल से वह इस घर का एक अहम सदस्य बन कर रहा ।मेरे बेटे और बेटी से ज्यादा हमारे साथ रहा ।दिन रात, 24*7 हमेशा-हमेशा जीव देने वाला यह जीव ऐसे अचानक हमेशा के लिए दूर हो जाएगा यह कभी सोचा न था।
चार दिन पहले मेरे पापा की तबीयत खराब हो गई थी तो मुझे महाराष्ट्र जाना पड़ गया। उस दिन फ्लाइट के लिए रवाना होने से पहले मेरे हाथ से उसने अच्छे से खाना खाया था। मुझे बाय-बाय भी किया था उसने। हाथ मिलाया था।
जब भी हम बाहर जाते हैं, वह हमारे स्टाफ से आराम से खाना खाता था और वही उसकी देखभाल करते थे। इस बार तो डॉक्टर साहब भी घर पर ही थे तो वह उनसे भी आराम से खाना खाता था ।लेकिन पता नहीं इस बार क्या हो गया, जो उसने मेरे जाने के बाद खाना ही छोड़ दिया ।थोड़ा बीमार सा लग रहा था, खांसी लग रही थी तो डॉक्टर को दिखाकर दवाइयां शुरू कर दी थी। लेकिन दूसरे दिन भी उसने कुछ नहीं खाया सिर्फ पानी पी रहा था, खाने की तरफ देख भी नहीं रहा था तो फिर तीन-चार डॉक्टर को बुलाकर दिखाया गया, गाड़ी में बिठाकर हॉस्पिटल भी ले जाया गया, उसको इंजेक्शन और ड्रिप पर रखा गया ।उसके अलावा कई डॉक्टर को कंसल्र्ट किया गया ,कुछ टेस्ट भी हुए और पता चला कि उसको कुछ किडनी प्रॉब्लम है ,उसी हिसाब से ड्रिप, इंजेक्शंस और ट्रीटमेंट शुरू हो गया। मेरा पूरा स्टाफ उसकी देखभाल में लगा हुआ था। सबको लग रहा था कि वह जल्दी ही ठीक हो जाएगा और फिर से सबके साथ पहले के जैसे खेलेगा, कुदेगा, भागेगा। पर वह चुपचाप सा हो गया था। हमेशा ऊपर नीचे करने वाला मार्शल चुपचाप हो गया था यह देखकर हमें भी डर लगने लग गया था। मेरा आधा मन तो मार्शल की तरफ था और आधा उधर। मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करें। मेरी बेटी की तो मार्शल जान था इसलिए मैंने उसकी पढ़ाई के बीच में ही उसे भी घर बुला लिया ताकि उसे देखकर वह ठीक हो जाए। पर ऐसा हो ना सका। उसने बहुत कोशिश की ,उसकी पूरी सेवा की, उसके साथ पूरा वक्त दिया ।लेकिन अफसोस! उसका वक्त आ गया था तो वह ठीक कैसे होता? उसकी छोटी सी टिमटिमाती आंखों को देखकर सबको दया आ रही थी। सभी को लगा कि उसकी वह आंखें मुझे ढूंढ रही है।
उसका हाल जानकर मुझे बड़ा दुख हो रहा था। मेरे पापा की तबीयत थोड़ी सी सुधरने लग गई थी। मैंने उसके पास आना उचित समझा ताकि मुझे देखकर वह कुछ खा ले और उसकी तबीयत ठीक हो जाए यही सोच कर मैंने पहली फ्लाइट पकड़ी और वापस आ गई।
मैं जैसे ही वहां पहुंची, मेरी आवाज सुनकर उसने उठने की कोशिश की। वह लड़खड़ाता हुआ मेरे पास आया। मैंने उसके माथे पर हाथ फेरा, उसे प्यार से सहलाया, मुझे लग रहा था, उसकी आंखें नम हो गई है। मैं उसे प्यार से सहलाती गई और शायद उसे सुकून मिल गया था और उसने अपनी आंखें बंद कर ली, गर्दन नीचे करके निश्चिंत सो गया।
एक दिन उसकी सेवा में गुजर गया। मैंने उसकी हर पसंदीदा चीज उसके सामने रखी पर उसने उसकी तरफ देखा भी नहीं। उसके चार दिन के व्रत पूरे हो चुके थे, जैसे वह संथारा कर रहा था ।
आज पांचवा दिन था आज शाम 5:00 बजे उसने अपना व्रत तोड़ दिया ।उसने दो बार दूध पिया वह भी डॉक्टर साहब के हाथ से । वह ठीक लग रहा था। आराम से बैठा हुआ था। उसकी आंखों में शांति थी। जब मैं हॉस्पिटल जाने लगी तो वह गेट खुलते ही चुपचाप अंदर आ गया, बिल्कुल हमेशा की तरह सर नीचे झुकाए और अपने फेवरेट कमरे में अपनी फेवरेट जगह पर जाकर बैठ गया। मैं वापस उसके पीछे-पीछे अंदर आ गई ।मुझे आश्चर्य हो रहा था कि उसमें इतनी ताकत कहां से आ गई कि वह बिना लड़खड़ाए आराम से पहले जैसे चल के अपने कमरे में आ गया। उसने बैठने के बाद मेरी तरफ देखा, शायद ऐसे लगा कुछ कहना चाह रहा है, मैं भी प्यार से उसे निहारती गई और बेटी से कह रही थी कि इसका ध्यान रखना ,इतने में उसने दो बार हिचकी ली और अपनी गर्दन नीचे डाल दी ।मुझे और मेरी बेटी को कुछ समझ में आता उससे पहले ही उसके प्राण पखेरू उड़ चुके थे ।
मैं और मेरी बेटी “मार्शल -मार्शल ” कहे जा रहे थे और उसे झंझोड रहे थे,लेकिन वह अब इस दुनिया को अलविदा कह चुका था। मार्शल हम सभी को बाय-बाय करके अपने आखिरी सफर पर रवाना हो चुका था। सब की आंखों को नम करके, सबको प्यार देकर, घर में प्यार भरा माहौल बनाकर वह जा रहा था अपनी इस योनि से मुक्ति की ओर।
मार्शल चला गया। सभी को छोड़कर चला गया। हम सभी को गम में डूबोकर वह अपनी अंतिम यात्रा पर चल दिया।
परमपिता परमात्मा उसकी आत्मा को शांति प्रदान करें और अपने श्री चरणों में उसे स्थान दे यही उनके चरणों में अर्जी है।
अलविदा मार्शल ।
बाय-बाय मार्शल
लव यू मार्शल
” मार्शल ,तुम बहुत याद आओगे।”

अलविदा मार्शल
31st October 2023 – 6:08pm
आज मार्शल हम सभी को छोड़कर अपने आखिरी सफर पर रवाना हो गया। कभी सोचा भी नहीं था कि यह सब इतना अचानक हो जाएगा। हमेशा खेलते -कुदते, हमारे पीछे-पीछे दौड़ने वाला यह मार्शल आज अचानक से हमारे से इस तरह जुदा हो जाएगा यह किसी ने भी नहीं सोचा था ।
मार्शल हम सभी का चहेता था ।सिर्फ एक महीने की उम्र में अपने माता-पिता से जुदा होकर मेरे आंगन में आया था। 19 दिसंबर उसका जन्म दिवस पर हमारे यहां वह 24 जनवरी को आया था।  यह दिन हम हमेशा उसके जन्मदिवस के रूप में मनाते हैं। 9 साल से वह इस घर में एक राजा की तरह  हमारे साथ रहा। वह मेरा शेर था और दिखता भी वैसे ही था। लंबा- चौड़ा,जन्म से माथे पर तिलक लगाए हुए, बिल्कुल एक शेर की तरह था। अगर कोई एक बार देख ले उसे तो डर के अपने पांव पीछे हटा ले। कोई भी अंजान उसके सामने आने की हिम्मत नहीं करता था।
मेरा बेटा हॉस्टल में पढ़ने के लिए चला गया और उसी  वर्ष  मार्शल का  घर में आगमन हो गया।  फिर दो-तीन साल बाद बेटी भी हॉस्टल पढ़ने चली गई और फिर मैं, मेरे पति और मार्शल यही सब यहां रह गए। अब तो वह  अपने आप को इस घर का बेटा मान कर हमारी सेवा करने लग गया था।
मार्शल  इतना चुलबुला ,समझदार और मासूम था कि किसी को भी उस पर प्यार आ जाए ,पर उसे देखते ही अच्छे-अच्छे के पसीने भी छूट जाते थे। एक बार अगर उसने भौंकना शुरू कर दिया तो किसी अनजान की हिम्मत नहीं होती कि उसके सामने आए। उसकी  टेरिटरी में एक परिंदा भी पर नहीं मार सकता था ।
हमारी तो हर बात वह समझता था। कोई कुत्ता भी इतना समझदार हो सकता है ? यह देखकर मुझे आश्चर्य होता था। कभी भी उसने किसी को तकलीफ नहीं दी थी। बीमार होने पर भी वह स्वयं कोशिश करता था कि किसी को तकलीफ ना हो ।कभी भी घर में उसने गंदगी नहीं की थी। टाइम पर अपने सारे काम निपटाता था। वक्त का इतना पाबंद तो शायद इंसान भी नहीं हो सकता जितना वह था। वक्त का उसे कैसे पता चलता था कि अभी 5:00 बज गए अभी 7:00 बज गए अभी 6:00 बज गए हैं, बिल्कुल चाहे घड़ी मिला लो, ऐसा  पंक्चुअल था।
हमारी कार की आवाज वह पूरी दुनिया में पहचान लेता था। कार का हॉर्न तो दूर सिर्फ कार चलने की आवाज से वह हमारी कार आ गई है और  बरामदे में आकर खड़ा हो जाता था ।
अगर कभी नीचे से मेरी आवाज आ गई तो रैम्प में आकर खड़ा हो जाता था ,चाहे फिर आधा घंटा लगे ,चाहे एक घंटा लगे, वह वहीं पर खड़ा रह कर इंतजार करता था, लेकिन कभी दहलीज को पार करके बाहर नहीं आता था। इतना समझदार था वह ।
कभी मैं अकेली जल्दी आ जाती या फिर डॉक्टर साहब जल्दी आ जाते तो वह दूसरे का इंतजार करता था। वह हम दोनों को ही अपना सब कुछ मानता था और इंतजार करते-करते कभी थकता नहीं था। बार बार बुलाने पर भी वह घर के अंदर  नहीं आता था जब तक कि हम सभी घर पर ना आ जाए।
रोज उसके साथ खेलना जरूरी था, उसके साथ घूमना जरूरी था,उसके साथ बातें करना जरूरी था और उसके साथ बैठकर टीवी देखना जरूरी था ।जब तक उसके साथ खेल ना लिए या मस्ती ना कर ली तब तक उसे चैन नहीं पड़ता था। वह हमें  हंसाता भी था, खिलाता भी था, मस्ती भी कराता था और कभी-कभी गुस्सा भी दिलाता था । लेकिन था वह अपना चुलबुला  मार्शल।
कभी अकेले में बोरियत हो जाती तो मस्ती करने के लिए कभी इधर-उधर दौड़ता था और अचानक कोई गमला तोड़ देता था या फिर कभी गमले से मिट्टी निकाल देता था तो चुपचाप कान नीचे करके जमीन पर पसरकर बैठ जाता था ताकि हमारी डांट ना पड़े और अगर डांट पड़ भी जाती तो सिर्फ कान के इशारे से उसका जवाब देता था और यह देखकर हमें हंसी आ जाती थी और हम उसे डांटना हीं भूल जाते थे। ऐसा था यह चालू मार्शल।
उसकी ऐसी हरकतें देखकर हंसी आ जाती थी और गुस्सा गायब हो जाता था। गलती का एहसास उसे हो जाता था और और फिर उसे डांटने का मन भी नहीं करता था ।
मार्शल बचपन में जब अपनी कार में राजा की तरह बैठकर क्लब जाता था खेलने के लिए तो रोड के सारे कुत्ते उसे पहचानने लग गए थे और कभी-कभी तो खाली कार वहां से गुजरती थी तब भी उसमें मार्शल है यह समझकर रोड के कुत्ते अपनी आवाज में,अपनी भाषा में उसे पुकारते थे तो उनकी समझदारी का एहसास होता था। जब  यह  एक राजा की तरह अपने दोस्तों पर भोंकते हुए अपनी सेंट्रो कार में सफर करता था तो एक महाराज से कम नहीं लगता था।मेरी बेटी ने तो उस
” सेंट्रो ” कार का नाम “मिसेंट्रो “कर दिया था और वह कार सिर्फ मार्शल की थी ।
दिन भर अंदर बाहर ,ऊपर नीचे दौड़ते हुए और परिंदे को उड़ाते हुए उसका दिन कैसे बीत जाता था शायद वह भी नहीं जानता था।
जब बेटा और बेटी हॉस्टल से आते थे तो  उसकी खुशी का ठिकाना नहीं रहता था।उनके साथ खेलना, और 24 घंटे उनके पीछे-पीछे दुम हिलाते हुए घूमते देखकर तो हम दोनों यही कहते थे कि यह तो मौका परस्त है और हमें तो भूल ही गया है।
जैसे ही कोई बाहर जाता था या उसकी सूटकेस पैकिंग के लिए उतारता था तो यह महाराज उदास होकर एक कोने में बैठकर टिमटिमाती हुई आंखों से उनकी गतिविधि को देखते रहते थे कि अब उसे कोई छोड़कर जाने वाला है और जब कोई वापस लौट कर आता था तो अपनी भाषा में वह बड़े जोर-जोर से खुशी जाहिर करता था। उसवक्त उसमें जो उत्तेजना दिखती थी उसका कोई ठिकाना न था। उसकी खुशी यही थी कि उसका घर का सदस्य वापस आ गया है।
जब भी बाहर जाते थे और वापस आने पर ताला खोलने पर घर में सबसे पहले एंट्री इन्हीं महाशय की होनी चाहिए यह उसका उसूल था, उसे कोई भी तोड़ नहीं सकता था।
शाम को आने के बाद जैसे कोई बच्चा चॉकलेट के लिए दादा दादी का बक्सा खुलने का इंतजार करता था  वैसे वह बिस्कुट के लिए इंतजार करता था और जब तक बिस्किट नहीं मिल जाते तब तक दो पांव पर खड़ा रहता था। ऐसा था यह मासूम मार्शल
सुबह अगर उठने में देरी हो जाती है तो यह  बेड के चक्कर लगाते हुए धीमी आवाज में गुर्राते हुए उठाने की कोशिश करता है और अपनी भाषा में कह रहा होता है,”अब उठ भी जाओ ,सुबह हो गई है ,घूमने जाना है।” और स्वयं घूमने जाने के लिए तैयार रहता है। और जब हम घूमने शुरू करते हैं तो हमारे पीछे-पीछे वह अपनी वॉक भी पूरी कर लेता है। ऐसा था यह समझदार मार्शल।
  मार्शल महाशय बेटी का तो  लाडो था। हॉस्टल से भी जब तक उसका हाल-चाल रोज नहीं जान लेती या कोई वीडियो ना देख लेती तब तक उसे चैन नहीं पड़ता था। हम सभी ने उसके मार्शल नाम के अलावा भी अनेको नाम रखे थे जिन्हें वह बखूबी समझता था जैसे “मिशी,मिशिया,मार्शू, टुटू”। ऐसे नाम उसे अपने है यह वह समझता था और इन्हीं नाम को भी वह उतना ही रिस्पांस देता था जितना की मार्शल को।
पिछले 9 साल से वह इस घर का एक अहम सदस्य बन कर रहा ।मेरे बेटे और बेटी से ज्यादा हमारे साथ रहा ।दिन रात, 24*7 हमेशा-हमेशा जीव देने वाला यह जीव ऐसे अचानक हमेशा के लिए दूर हो जाएगा यह कभी सोचा न था।
चार दिन पहले मेरे पापा की तबीयत खराब हो गई थी तो मुझे महाराष्ट्र जाना पड़ गया। उस दिन फ्लाइट के लिए रवाना होने से पहले मेरे हाथ से उसने अच्छे से खाना खाया था। मुझे बाय-बाय भी किया था उसने। हाथ मिलाया था।
जब भी हम बाहर जाते हैं, वह हमारे स्टाफ से आराम से खाना खाता था और वही उसकी देखभाल करते थे। इस बार तो डॉक्टर साहब भी घर पर ही थे तो वह उनसे भी आराम से खाना खाता था ।लेकिन पता नहीं इस बार क्या हो गया, जो उसने मेरे जाने के बाद खाना ही छोड़ दिया ।थोड़ा बीमार सा लग रहा था, खांसी लग रही थी तो डॉक्टर को दिखाकर दवाइयां शुरू कर दी थी। लेकिन दूसरे दिन भी उसने कुछ नहीं खाया सिर्फ पानी पी रहा था, खाने की तरफ देख भी नहीं रहा था तो फिर तीन-चार डॉक्टर को बुलाकर दिखाया गया, गाड़ी में बिठाकर हॉस्पिटल भी ले जाया गया, उसको इंजेक्शन और ड्रिप पर रखा गया ।उसके अलावा कई डॉक्टर को कंसल्र्ट किया गया ,कुछ टेस्ट भी हुए और पता चला कि उसको कुछ किडनी प्रॉब्लम है ,उसी हिसाब से ड्रिप, इंजेक्शंस और ट्रीटमेंट शुरू हो गया। मेरा पूरा स्टाफ उसकी देखभाल में लगा हुआ था। सबको लग रहा था कि वह जल्दी ही ठीक हो जाएगा और फिर से सबके साथ पहले के जैसे खेलेगा, कुदेगा, भागेगा। पर  वह चुपचाप सा हो गया था। हमेशा ऊपर नीचे करने वाला मार्शल चुपचाप  हो गया था यह देखकर हमें भी डर लगने लग गया था। मेरा आधा मन तो मार्शल की तरफ था और आधा उधर। मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करें। मेरी बेटी की तो मार्शल जान था इसलिए मैंने उसकी पढ़ाई के बीच में ही उसे भी घर बुला लिया ताकि उसे देखकर वह ठीक हो जाए। पर ऐसा हो ना सका। उसने बहुत कोशिश की ,उसकी पूरी सेवा की, उसके साथ पूरा वक्त दिया ।लेकिन अफसोस! उसका वक्त आ गया था तो वह ठीक कैसे होता? उसकी छोटी सी टिमटिमाती आंखों को देखकर सबको दया आ रही थी।  सभी को लगा कि उसकी वह आंखें मुझे ढूंढ रही है।
उसका हाल जानकर मुझे बड़ा दुख हो रहा था। मेरे पापा की तबीयत थोड़ी सी सुधरने लग गई थी। मैंने  उसके पास आना उचित समझा ताकि मुझे देखकर वह कुछ खा ले और उसकी तबीयत ठीक हो जाए यही सोच कर मैंने पहली फ्लाइट पकड़ी और वापस आ गई।
मैं जैसे ही वहां पहुंची, मेरी आवाज सुनकर उसने उठने की कोशिश की। वह लड़खड़ाता हुआ मेरे पास आया। मैंने उसके माथे पर हाथ फेरा, उसे प्यार से सहलाया, मुझे लग रहा था, उसकी आंखें नम हो गई है। मैं उसे प्यार से सहलाती गई और शायद उसे सुकून मिल गया था और उसने अपनी आंखें बंद कर ली, गर्दन नीचे करके निश्चिंत सो गया।
एक दिन उसकी सेवा में गुजर गया। मैंने उसकी हर पसंदीदा चीज उसके सामने रखी पर उसने उसकी तरफ देखा भी नहीं। उसके चार दिन के व्रत पूरे हो चुके थे, जैसे वह संथारा कर रहा था ।
आज पांचवा दिन था आज शाम 5:00 बजे उसने अपना व्रत तोड़ दिया ।उसने दो बार दूध पिया वह भी डॉक्टर साहब के हाथ से । वह ठीक लग रहा था। आराम से बैठा हुआ था। उसकी आंखों में शांति थी। जब मैं हॉस्पिटल जाने लगी तो वह गेट खुलते ही चुपचाप अंदर आ गया, बिल्कुल हमेशा की तरह सर नीचे झुकाए और अपने फेवरेट कमरे में अपनी फेवरेट जगह पर जाकर बैठ गया। मैं वापस उसके पीछे-पीछे अंदर आ गई ।मुझे आश्चर्य हो रहा था कि उसमें इतनी ताकत कहां से आ गई कि वह बिना लड़खड़ाए  आराम से पहले जैसे चल के अपने कमरे में आ गया। उसने बैठने के बाद मेरी तरफ देखा, शायद ऐसे लगा कुछ कहना चाह रहा है, मैं  भी प्यार से उसे निहारती गई और बेटी से कह रही थी कि इसका ध्यान रखना ,इतने में  उसने दो बार हिचकी ली और अपनी गर्दन नीचे डाल दी ।मुझे और मेरी बेटी को कुछ समझ में आता उससे पहले ही उसके प्राण पखेरू  उड़ चुके थे ।
मैं और मेरी बेटी “मार्शल -मार्शल ” कहे जा रहे थे और उसे झंझोड रहे थे,लेकिन वह अब इस दुनिया को अलविदा कह चुका था। मार्शल हम सभी को बाय-बाय करके अपने आखिरी सफर पर रवाना हो चुका था। सब की आंखों को नम करके, सबको प्यार देकर, घर में प्यार भरा माहौल बनाकर वह जा रहा था अपनी इस योनि से मुक्ति की ओर।
मार्शल चला गया। सभी को छोड़कर चला गया। हम सभी को गम में डूबोकर वह अपनी अंतिम यात्रा पर चल दिया।
परमपिता परमात्मा उसकी आत्मा को शांति प्रदान करें और अपने श्री चरणों में उसे स्थान दे यही उनके चरणों में अर्जी है।
अलविदा मार्शल ।
बाय-बाय मार्शल
लव यू मार्शल
” मार्शल ,तुम बहुत याद आओगे।”

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