चाहे उम्र कोई भी हो
हमारे अंदर एक बच्चा है जी
चाहे जवान हो या बुढ़ा
दिल तो बच्चा है जी।
यह केवल वर्ष हैं जो बढ़ते हैं,
जिंदगी की भाग दौड़ में बाल सफेद होते हैं
चेहरे पर झुर्रियां भी आती है
लेकिन फिर भी मन तो बच्चा है जी
दिल तो सच्चा है जी।
बरस -दर- बरस मीठे कड़वे अनुभव जुड़ते हैं
भूल जाते हैं कि मन भी कभी कोमल था,
ऐसी ही इन कोमल भावनाओं का दम घोंटकर
बढ़ जाते हैं जिंदगी के इस सफर में
अपने ही बचपन को तिलांजलि देकर
गुम हो जाते हैं, लेकिन फिर भी
दिल तो बच्चा है,सच में सच्चा है जी।
मत भूलो उस बचपन को
जिसको हमने जिया है –
हंसते -गाते ,खेलते -कुदते।
अब मान भी जाओ,
उस बचपन पर अधिकार स्वयं का जमा लो,
अब लौट आने दो उस बचपन को
जिसको बरसों पहले छोड़ा है
याद रहे
दिल तो बच्चा है जी, सच में सच्चा है जी।
मत भूलो,
पीछे मुड़कर देखने के लिए हमेशा कुछ न कुछ होता है जी
सिर्फ उसे जीने की चाहत हो , और
लौट आओ उस पुराने बचपन में।
सच में दिल तो बच्चा है जी ,मन तो सच्चा है जी।
आज आज़ाद होने का दिन है
पिंजरे की बेड़ियाँ तोड़ने के लिए,
अपने अंदर के बच्चे को मुक्त करो जी
इससे पहले कि गुमनाम बनो
लौट आओ उस बचपन में,
सच में दिल तो बच्चा है जी, मन तो सच्चा है जी।
डॉ मंजू राठी
एमबीबीएस एमडी
एलएलबी एलएलएम
ब्लॉगर ,लेखिका और समाजसेविका