
हसरतें
शशांक एक बहुत ही सुशील लड़का था । दो बहनों में एक भाई । सब का लाडला । माता पिता की आंखों का तारा। पढ़ाई पूरी करके पिताजी के ज्वैलरी बिजनेस को ही अपना करियर बना लिया था। पापा तो पुराने जमाने के ज्वेलर्स थे पर शशांक ने पापा के बिजनेस में आधुनिकता और फैशन का ऐसा तड़का लगाया कि उसकी एक मंजिल की दुकान की जगह तीन मंजिला ज्वेलरी शॉप की बड़ी इमारत खड़ी हो गई थी ।माता-पिता अब उसकी शादी के सपने देखने लग गए थे ।लेकिन बड़ी बहन की शादी पहले करनी थी तो शशांक का नंबर बाद में आना था। इसी दरम्यान बहन की सगाई हो गई। शशांक ने भी बहन की शादी में कोई कमी नहीं छोड़ी। सारी जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली। उसने 5 दिन लगातार इतने सुंदर कार्यक्रम रखे की देखने वाले हतप्रभ रह गए । बहन की बारात में उसने दिल खोलकर पैसा ऊंवारा। बहन की शादी एक सेलिब्रिटी की शादी जैसी की । बहन विदा हो गई। फूट फूट कर रोया था वह। बचपन का भाई बहन का प्यार एक दूसरे से विदा हो रहा था ।पर उस वक्त उसे सहारा दिया उसकी छोटी बहन और उसकी प्रेमिका ने।
जी हां, शशांक प्यार करता था मोना से। बेइंतहा प्यार करता था वह उसे । वह अपनी सारी परेशानियां उसके मिलने के बाद भूल जाता था। वह वक्त भी बड़ा खूबसूरत था । दिन भर काम करता और शाम को अपनी प्रेमिका के संग कुछ पल बिताता था । घरवाले सभी जानते थे मोना के बारे में । पड़ोस में जो रहती थी। बचपन से साथ खेले थे दोनों । घर पर दोनों परिवारों का आना – जाना था । मोना ने भी शशांक की बहन की शादी में शशांक का पूरा साथ दिया था । आधी से ज्यादा जिम्मेदारी तो उसी ने संभाल रखी थी ।
दो प्रेमी एक दूसरे की भाषा आंखों से ही समझ लेते थे । मोना शशांक से कितना प्यार करती थी यह सिर्फ शशांक ही जानता था । यूं कहो, शशांक की हर चाहत पर वह कुर्बान थी ।शशांक उसके बिना जीने की कभी सोच भी नहीं सकता था। इतना प्यार होने के बावजूद भी वह दोनों शादी नहीं कर सकते थे। फिर ऐसी कौन सी अड़चन थी उनकी शादी में? यही बात तो सभी की समझ से परे थी ।
शशांक मोना से ही शादी करने की जिद पर अड़ा था और उसके पिताजी यह नहीं चाहते थे। पिताजी चाहते थे कि शशांक उनकी हैसियत के हिसाब से कोई अमीर लड़की से शादी कर ले क्योंकि मोना मध्यम वर्गीय परिवार से थी और एक महत्वपूर्ण बात यह थी कि मोना की कुंडली शशांक से नहीं मिलती थी और उनके पिताजी को किसी ने कह दिया था कि अगर मोना कि शशांक से शादी हो गई तो शशांक की जिंदगी को खतरा है। उसके पिताजी एक बार मोना से शादी करने के लिए मान भी जाते लेकिन उनके दिमाग में यह बात घर कर चुकी थी कि मोना से शादी करने से उनके बेटे के जीवन को खतरा है और वह अपने बेटे से बहुत प्यार करते थे और कोई भी पिता अपने बेटे की जिंदगी किसी भी कीमत पर दांव पर नहीं लगाना चाहेगा। फिर लोग इसे उनका विश्वास कहे या अंधविश्वास कहे उन्हें फर्क नहीं पड़ता था। इसीलिए हर बार जब भी शशांक की शादी की बात होती तो मोना के लिए वे मना कर देते। ऐसी बातें तो उसके पिताजी सोचते थे पर शशांक ऐसा नहीं सोचता था। उसने मोना के साथ जीने मरने की कसमें खाई थी। उसने अपने पिताजी से एक दिन कह दिया था,
” पिताजी, देखो ,आज आप मुझे रुला रहे हो लेकिन एक दिन ऐसा आएगा आप मेरे लिए रोओगे ।”
सभी उसकी बात पर हंस पड़े थे। बात आई गई हो गई थी। किसी ने उस बात को ज्यादा तवज्जो भी नहीं दी थी। दिन बीत रहे थे। शशांक और मोना रोज मिलते थे। साथ घूमते थे। साथ अच्छा वक्त गुजारते थे। मोना के साथ शशांक की दिनभर की थकान मिट जाती थी। काम का प्रेशर ज्यादा था लेकिन मोना के सानिध्य में वह अपनी सारी परेशानियां भूल जाता था। वह उसका सपोर्ट थी, हर फैसले में वह मोना से विचार विमर्श करता और वह उसे सही राय देती।
मोना जानती थी कि शशांक के पिताजी उसे खास पसंद नहीं करते पर वह कभी भी शशांक पर शादी का दबाव नहीं डालती थी। उसका प्यार सच्चा था। कभी-कभी तो शशांक झूंझला जाता था पर वह समझा बूझाकर उसे शांत कर देती थी और कहती थी जो मेरी किस्मत में होगा वह हो जाएगा तुम्हें इतना परेशान होने की जरूरत नहीं है ।अगर पिताजी कहते हैं तो तुम्हारी भलाई के लिए ही कुछ कहते होंगे ,तुम उनकी बात पर भी गौर करना। मोना ने कभी भी शशांक को किसी भी बात के लिए मजबूर नहीं किया था ।वह दोनों तो मन की डोर से बंधे हुए थे।
शशांक और मोना की इच्छा थी कि वे दोनों उसके पिताजी की
रजामंदी से ही शादी करेंगे और इसीलिए शशांक ने कभी भी पिताजी पर शादी के लिए दबाव नहीं बनाया था । उसे पता था कि एक दिन पिताजी जरूर मान जाएंगे । मोना की अच्छाइयां उन्हें मजबूर कर देगी ।उसे अटल विश्वास था पर मोना को इस बात से फर्क नहीं पड़ता था। वह तो सिर्फ और सिर्फ शशांक से प्यार करती थी और वह उसे परेशान नहीं देख सकती थी ।उसकी दुनिया ही शशांक से शुरू होती थी और उसीपर खत्म होती थी ।दिन बीत रहे थे। शशांक अपने बिजनेस में ऊंचाइयां छू रहा था ।मोना उसका प्रबल सपोर्ट थी। घर में शशांक के सामने उसकी शादी कि चर्चा कम ही होती थी ताकि घर का माहौल खुशनुमा रहे । बहनें पिताजी को समझाने की कोशिश करती पर वे बात टाल देते। उन्हें डर था, शशांक की मोना से शादी करने से शशांक की जिंदगी को खतरा हो जाएगा। यही बात उनके जहन में घर कर चुकी थी।
मोना की अच्छाइयों ने शशांक के पिताजी का दिल जीत लिया था।
अब तो मोना भी उन्हें पसंद आने लगी थी। मोना के स्वभाव से अब वो बदल गए थे। उनकी वह एक ही चिंता उन्हें खाई जा रही थी। किसी को इस बात का इल्म नहीं था तो सभी यही सोचते थे कि पिताजी को अमिर खानदान की बहू चाहिए इसीलिए वह मोना के लिए मना कर रहे हैं। लेकिन उनके दिल की हालत वे ही समझ सकते थे। शशांक उनका इकलौता बेटा है और वे उसे बेहद प्यार करते हैं।
शशांक और उसका परिवार मामा के यहां शादी में गए हुए थे ।शशांक मोना को भी साथ लेकर गया था ।शादी में सभी को लगता था कि अब अगला नंबर शशांक और मोना का ही होगा ।सभी ने उन्हें देखकर आशीर्वाद भी दिया था।” बहुत सुंदर जोड़ी ” कहकर सभी ने नजर भी उतारी थी । मोना शर्म के मारे लाल हो रही थी। शादी संपन्न हो गई ।सारी रस्में निपट गई थी। रिसेशन में आए सभी मेहमान लगभग जा चुके थे ।अब शशांक और मोना भी खाना खाने बैठ गए थे। दोनों ने अपने दोस्तों के साथ खाना खाया, खुलकर हंसी मजाक भी किया ,खूब बातें की ,शशांक के दोस्त अब उसे छेड़ रहे थे। शशांक की शादी के विषय पर चर्चा हो रही थी । सभी मस्ती के मूड में थे। लेकिन अब काफी रात हो गई थी और सभी को जाना भी था इसलिए अपने गपशप को विराम देते हुए सभी उठ खड़े हुए। सब दोस्त विदा लेने लगे तो मोना ने भी कहा ,
“शशांक, मैं घर जा रही हूं, तुम आराम से कल के फंक्शन पूरे करके आना ।” शशांक ने उसे रोकने की कोशिश की पर वह नहीं मानी। रात में किसी के यहां रुकना उसे गंवारा नहीं लगा और शशांक से विदा लेकर वह उसके दोस्तों के साथ घर आ गई।
मोना घर तो आ गई पर अपना दिल वही छोड़ आई। रात भर करवटें बदलती रही ।शशांक के रिश्तेदारों की आवाजें उसके कानों में गूंज रही थी , “कितनी सुंदर जोड़ी है – किसी की नजर ना लगे ” वगैरह वगैरह। वह मन ही मन मुस्कुरा रही थी। शशांक के साथ अपनी जिंदगी के सपने खुली आंखों से देख रही थी। वह सुखद अहसास उसकी आंखों में चमक भर रहा था । होठों पर गुलाबी मुस्कान छा गई थी ।रात भर शशांक के साथ अपनी जिंदगी का ताना-बाना बुनती रही ।मन में अनेक हसरतें मुकाम पर पहुंचने की कोशिश कर रही थी। गालों पर लालिमा छा रही थी। रात भर सोचती रही और करवटें बदलती रही। वह मुस्कुराता हुआ शशांक का चेहरा, उसकी हंसी मजाक वाला अंदाज ,उसका केयरिंग नेचर, उसकी शेरवानी में सजी हुई पर्सनालिटी ,सभी तो उसे सोने नहीं दे रही थी। उसने सारी रात आंखों में ही निकाल दी। शशांक के साथ आगे की पूरी जिंदगी की उसने प्लानिंग कर ली थी। दिल में बसी सभी हसरतों को मुकम्मल करने का वक्त आ रहा था ।मन में उमंग थी, आंखों में प्यार था और दिल में नयी जिम्मेदारी उठाने का एहसास था। इन बातों पर सोचते सोचते कब सुबह हो गई पता ही नहीं चला ।बिना सोए ही वह उठ गई और नहा धोकर तैयार होकर सुबह जल्दी ही मंदिर भी जाकर आ गई। जब चाय पी रही थी तो शशांक का फोन आ गया। नंबर फ्लैश होते ही उसके होठों पर हल्की सी मुस्कान छा गई।
” अकेले-अकेले चाय पी रही हो ? रुको , मैं भी आ रहा हूं । मेरे लिए चाय चढ़ा कर रखना। मैं यहां से निकल रहा हूं ।”
“अरे बाबा, आराम से आना। चाय तैयार रहेगी।” और वह शर्मा गई और शशांक ने हंसते हुए फोन डिस्कनेक्ट कर दिया। वह चाय का कप हाथ में लिए उस मोबाइल की तरफ काफी देर तक देखती रही और मन ही मन मुस्कुराती रही। उसे पता ही नहीं चला कि उसकी चाय ठंडी हो चुकी है। होश तो तब आया जब मम्मी ने उसे टोका। उसने कप की तरफ देखा तो पता चला चाय पानी हो चुकी है। उसने कप मेज पर रख दिया और वही बैठे-बैठे शशांक का इंतजार करने लगी और चाय अब साथ में ही पियेंगे यही सोच कर अखबार उठा लिया और समाचार देखने लग गई ।पर मन तो अखबार में था ही नहीं बार-बार नजर घड़ी की तरफ उठ रही थी। दो-तीन बार मोबाइल हाथ में लिया और सोचा कॉल लगाकर पूछ लूं पर फिर सोचा शशांक ड्राइव कर रहा होगा, उसे डिस्टर्ब करना ठीक नहीं होगा और मोबाइल वापस मेज पर रख दिया।
शशांक ने तो कुछ ही देर में आने को कहा था पर अब तो डेढ़ घंटा बीत गया। उसका दिल बेचैन हो रहा था। उसका फोन भी नहीं आया था। दो बार चाय का पानी गर्म कर चुकी थी ।अब सब्र का बांध टूट रहा था और उसने उसे फोन करने के लिए मोबाइल उठाया ही था कि कोई अनजान नंबर से फोन बज उठा। उसने तुरंत ही फोन उठा लिया और “हेलो ” कहा ।
जैसे ही उसने फोन उठाया उसे फोन पर शोर सुनाई दिया और तभी उधर से आवाज आई,
” यह जिनका फोन है उनका भयंकर एक्सीडेंट हो गया है और उनकी—— शायद मौत हो चुकी है ।”
फोन हाथ से गिर गया। वह लडखडा कर गिरने ही वाली थी कि पीछे से मम्मी ने उसे थाम लिया। उसका चेहरा सफेद पड़ गया था। आंखें शुष्क हो चुकी थी। उसकी यह बदहवास हालत देखकर मम्मी घबरा गई , उसने उसे झंझोड़ा।
” क्या हुआ बेटा ? किसका फोन था ?”
तब कहीं जाकर उसे होश आया। उसने झट से मोबाइल उठाया और उस नंबर पर वापस डायल किया तो पुलिस ने फोन उठाया।
उसने अपने आप को संयत किया और पूछा,
” आप कहां से बोल रहे हो ?”
पुलिस वाले ने पता बता दिया।
उसने कहा,” आप उन्हें अस्पताल पहुंचा दो प्लीज ।”
“मैडम, उनके साथ दो लड़कियां और है ,वे भी गंभीर हालत में है। हम पहले उन्हें अस्पताल लेकर जा रहे हैं ।इनकी तो शायद मृत्यु हो चुकी है । आप कौन लगते हो इनके ? आप जल्दी पहुंचे।”
” सुनिए तो ——” वह कुछ कहना चाह रही थी उससे पहले ही फोन कट गया। वह शशांक के घर की तरफ दौड़ पड़ी। पीछे-पीछे उसकी मम्मी भी भागी। मोना गेट से ही चिल्ला रही थी ,”अंकल –अंकल”। उसकी घबराई हुई आवाज सुनकर शशांक के पापा दौड़ते हुए ही बाहर आए ।वह सीधी उनसे जाकर लिपट गई ।वह हड़बड़ा गए ।
” क्या हुआ बेटा ? क्या बात है? ” वह बोल ही रहे थे कि उनकी नजर मोना की मां पर पड़ी जो दौड़ते हुए आ रही थी और जोर-जोर से हांफ रही थी ।उन्होंने मोना को अपने से दूर किया और पूछा,
” क्या हुआ बेटा? तुम दोनों ऐसे दौड़ के क्यों आई हो? “
उसने अंकल को अंदर ले जाकर सोफे पर बिठाया और फिर उनका हाथ पकड़ कर कहा,
” पापा, श–श–शशांक—— नहीं रहा । उसका एक्सीडेंट—— हो गया ।”
शब्द मुश्किल से निकल रहे थे और उसके मुंह से अनायास ही पापा निकल गया था ।
झटके से अपना हाथ छुड़ाते हुए उन्होंने मोना को अपने आप से दूर किया। वह कुछ बोल ही नहीं पा रहे थे। तभी मोना झट से वहां से उठी और डाइनिंग रूम से कार की चाबी लेकर कार की तरफ दौड़ पड़ी।
कार स्टार्ट करके गेट से बाहर आ गई तब तक मोना की मम्मी शशांक के पापा को पकड़कर बाहर ले आई और कार की आगे की सीट पर बिठा दिया । शशांक के पापा अभी भी सदमे में थे ।उन्हें होश तो तब आया जब कार हाईवे पर पहुंच गई थी । फिर तो उन्होंने झटपट अपने कुछ खास रिश्तेदारों और दोस्तों को फोन करके उन्हें एक्सीडेंट की जगह पर आने के लिए कहा। मोना कार फर्राटे से दौड़ा रही थी। जब वे वहां पहुंचे तो काफी भीड़ थी। भीड़ को चीरते हुए वे दोनों वहां तक पहुंचे जहां शशांक लेटा हुआ था। उन्होंने शशांक को देखा जो एक सफेद कपड़े में ढका हुआ था ।मोना वही ठिठक गई । उसके पापा ने कपड़ा उठाकर उसका चेहरा देखा तो वे अपने आप को रोक नहीं पाए और वही बेसुध होकर गिर पड़े । लोगों ने उन्हें सहारा दिया तभी उनके रिश्तेदार और कुछ दोस्त वहां पहुंच गए ।जब उन्हें पता चला कि दो लड़कियों को अभी हॉस्पिटल लेकर गए हैं तो सभी हॉस्पिटल की तरफ निकल पड़े। मोना वही शशांक के पास रुक गई ।उसने एक बार फिर से उसके चेहरे से कपड़ा हटाया और जी भर कर उसे देखना चाहती थी । तभी पुलिस ने कहा इन्हें पोस्टमार्टम के लिए ले जाना पड़ेगा ।वह उसकी बॉडी को एंबुलेंस में शिफ्ट करना चाह रहे थे और मोना पथरीली आंखों से उसे निहार रही थी। ना वह रोई और ना ही कुछ बोली ।वह सिर्फ वे लोग क्या कर रहे हैं यह देख रही थी और जैसे ही बॉडी को एंबुलेंस में शिफ्ट किया वह भी एंबुलेंस में जाकर बैठ गई ।पुलिस ने भी उसे टोका नहीं ।उधर शशांक की दोनों बहने गंभीर घायल थी। प्रायमरी ट्रीटमेंट के बाद एक को वहीं भर्ती कर लिया गया पर एक ही हालत काफी नाजुक थी इसलिए उसे मुंबई एयरलिफ्ट करने की कोशिश की जा रही थी ।
एक पल में सब कुछ खत्म हो गया था। शशांक की बॉडी पोस्टमार्टम के बाद घर आ गई। सबका रो-रो कर बुरा हाल था पर मोना की आंखों में एक भी आंसू नहीं था। घर का इकलौता चिराग बुझ चुका था ।अंतिम विदाई की तैयारी चल रही थी। मोना शशांक के पास ही बैठी थी। वह चुपचाप उसे निहार रही थी। उसकी पलके बस उसी के चेहरे पर टिकी हुई थी। पंडित जी ने अंतिम विधियां पूरी करने के बाद कहा इसके मुंह में कुछ स्वर्ण रख दीजिए। मोना ने बिना कुछ सोचे समझे अपने हाथ में शशांक की दी हुई उसकी आखिरी निशानी सोने की अंगूठी अपनी उंगली से उतारी और उसके मुंह में रख दी। कोई और कुछ स्वर्ण आभूषण लेकर आता उससे पहले ही शशांक की अर्थी गमगीन माहौल में उठ गई । शशांक का अंतिम संस्कार हो गया सब घर वापस आ गए। मोना ने भी स्नान करके उसके घर की जिम्मेदारी संभाल ली। वह चुपचाप सभी का काम करती। शशांक के मम्मी और पापा का ख्याल रखती ।पर वह ना कुछ बोलती ना ही रोती। मोना की मम्मी को चिंता होने लगी कहीं सदमे से उसे कुछ हो ना जाए? शशांक के पापा भी परेशान थे। उसे समझाने की कोशिश की पर कोई फायदा नहीं हुआ ।घर वालों ने उसे ताने मारे, भला बुरा कहा ,बिन ब्याही बहू भी कहा, पर कुछ असर ना हुआ। शायद उसकी आत्मा शशांक के साथ ही चली गई थी। उसकी पाषाण आंखों में कोई उमंग , कोई हसरतें नहीं रही।
शशांक की एक बहन को मुंबई एयरलिफ्ट किया गया तब शशांक की मम्मी बेटी के साथ वहां चली गई और पिताजी दूसरी बेटी के साथ रुक गए । मोना दिन रात उनकी सेवा करती। घर संभालती और रात को 11-12 बजे अपने घर जाती और सुबह 5:00 बजे ना धोकर वापस शशांक के घर आ जाती। शशांक की मम्मी को फोन पर उसकी बहन के हाल-चाल पूछती और वक्त मिलता तब मंदिर में बैठकर उसके लिए प्रार्थना करती ।
मोना की हालत किसी से देखी नहीं जा रही थी।उसके मम्मी पापा बेटी की हालात देखकर रोते थे ।उसका भाई उसे कैसे भी रुलाने की कोशिश करता था पर कोई सफलता नहीं मिलती। दसवे दिन खबर आई कि शशांक की बहन का स्वर्गवास हो गया और उसका अंतिम संस्कार वही मुंबई में ही किया जाएगा। बस, इस खबर ने उसे तोड़ दिया और 10 दिन से सुप्त पड़े आंसू बह निकले। वह रोई और रोती ही गई। किसी ने उसे चुप कराने की कोशिश भी नहीं की। वह अब समझ पाई कि उसका सब कुछ खत्म हो गया है । उसे एहसास हो चला कि उसकी दुनिया उजड़ चुकी है। उसके सारे सपने बिखर चुके हैं। उसकी सारी हसरतों को तिलांजलि अर्पित हो चुकी है। वह खामोश हो गई।
दिन बीत रहे थे ।शशांक की बड़ी बहन घर आ गई थी ।वह ठीक हो रही थी। मोना उसकी अच्छे से देखभाल कर रही थी ।दो बच्चों को, दो जिगर के टुकड़ों को खोने के बाद शशांक के मम्मी पापा की हालत खराब थी। वह उनके बच्चों की जगह तो नहीं ले सकती थी लेकिन कोशिश कर रही थी कि उनका सहारा बन जाए और उनका दुख कुछ कम हो जाए। उसका रोज का वही सिलसिला था, सुबह से शाम तक सबकी सेवा करती, घर संभालती ।शशांक के मम्मी पापा को संभालती। वह अपने आप को तो भूल ही चुकी थी। उसका दर्द सभी समझते थे पर उपाय किसी के पास नहीं था।
शशांक के पापा से अब इस बच्ची का दर्द देखा नहीं जा रहा था। कुछ तो उपाय करना ही पड़ेगा ,इसके बारे में वे सोचते रहते थे । एक अच्छा सा लड़का देखकर उसके मम्मी पापा से बात करके उसका रिश्ता जल्द से जल्द तय कर दिया जाए और एक अच्छा सा मुहूर्त निकाल कर उसकी शादी कर दी जाये। वह इस तरह की प्लानिंग करने लगे। वह इस माहौल से निकलकर किसी नई जगह पर अपनी नई दुनिया बसाए जहां शशांक की यादों से वह अपना पीछा छुड़ा सके और अपनी जिंदगी को एक नया मोड़ दे ,यही उनका मकसद था।
पर मोना इस बात पर राजी नहीं होगी यह सभी को पता था। उसे कैसे मनाया जाए ? कैसे मनाया जाए यह बड़ा प्रश्न था सभी के सामने।आखिर में शशांक के पापा ने ही यह जिम्मेदारी उठाने की सोची ।एक दिन मोना को अपने पास बिठाकर उन्होंने उसे कहा,
” मोना बेटा , तेरी कुंडली देखकर मैंने शशांक को इस रिश्ते से मना किया था। पर मुझे नहीं पता था कि शशांक की कुंडली तुम्हारे लिए ठीक नहीं थी। मेरे बेटे की वजह से आज तुम्हारी यह हालत है। तुम्हारी इस हालात का जिम्मेदार मेरा बेटा है। मैं उसे कभी माफ नहीं करूंगा ।” उनका गला रूंध आया और आंखें भर आई।
उनकी बातें मोना के दिल को चुभ गई। वह कुछ देर चुप रही और फिर बोली ,
” पापा , शशांक को कुछ मत कहिए। उसका कोई दोष नहीं। मेरा नसीब ही ऐसा है। आप शशांक को मत कोसिए। शशांक बहुत अच्छा है।”
” है नहीं —- था —था कहो बेटा । ‘था ‘। वह जा चुका है इस दुनिया से। वह मर चुका है ।वह हमें छोड़कर जा चुका है ।”
शशांक के पापा ने बड़े ही कठोरता से कहा ।
” पापा, ऐसा मत कहीए ।वह जिंदा है ,आपके दिल में ,मेरे दिल में, सभी के दिल में वह है ।” मोना रोते हुए कह रही थी ।
” झूठ! वह अब हमारे किसी के दिल में नहीं है। उसको हम सभी भुला चुके हैं और और तुम भी बुला दो। मैंने तुम्हारे लिए एक अच्छा लड़का देखा है,वह तुम्हें हमेशा खुश रखेगा। मैं तुम्हें अपनी बहू तो नहीं बना सकता पर एक बेटी की तरह इस घर से विदा करूंगा।”
वे भावुक हो रहे थे।
“नहीं पापा — यह नहीं हो सकता।”
“आपकी हर बात मेरे सर आंखों पर । पर —-पर यह नहीं हो सकता।” उसने एक-एक शब्द पर जोर देते हुए बड़े ही दृढ़ता से कहा।
” यह मेरा आखिरी फैसला है , शशांक मर चुका है और अब उसका तुम्हारे साथ कोई रिश्ता नहीं है और ना ही हमारे साथ उसका कोई रिश्ता है। जो चला गया उसकी यादों में हम हमारा अगला जीवन बर्बाद नहीं कर सकते और तू भी मत कर। जा, जिले अपनी जिंदगी। और आज के बाद दोबारा इस घर में कदम मत रखना।”
उन्होंने बड़े ही दृढ़ता से कहा और उससे दूर हो गए।
उनकी आंखें नम हो गई और लाख कोशिश करने के बावजूद भी दो बूंदें उनके गालों पर सरक आई। उनके कानों में शशांक के शब्द गूंज रहे थे , “देखो पापा, एक दिन मैं आपको रुलाऊंगा।”
मोना रोती रही। लेकिन कोई उसके आंसू पोंछने नहीं आया ।अब कोई भी उसे कमजोर नहीं करना चाहता था ।उसने अपनी नज़रें सब पर दौडाई पर किसी ने उसकी तरफ ध्यान नहीं दिया। वह हताश होकर वहां से चली गई ।वह रोज सुबह आती पर उसके लिए दरवाजा नहीं खुलता । कुछ दिन यह सिलसिला चलता रहा ।फिर धीरे-धीरे उसका आना बंद हो गया । बड़ा कठिन फैसला था शशांक के घर वालों के लिए इस तरह का व्यवहार करना, पर ऐसा करना जरूरी था। उसकी संपूर्ण जिंदगी का सवाल था ।अगर आज वह इतना कठोर नहीं बनेंगे तो उसकी आने वाली जिंदगी तबाह हो जाएगी और वह ऐसा कभी नहीं चाहते थे।
धीरे-धीरे मोना के मम्मी पापा ने उसे शादी के लिए मना लिया। बुझे मन से , टूटे हुए दिल से उसने ‘हां ‘ कह दी ।शशांक के पापा ने बड़े ही धूमधाम से उसकी शादी रचाई। जब यज्ञ की वेदी पर मंत्रोच्चार हो रहे थे तब उसकी नज़रें शशांक के पिताजी पर पड़ी, उनकी आंखों से निरंतर अश्रु बह रहे थे। उनके उन अश्रुओं में और अग्नि की पवित्र ज्वाला में अपनी हसरतों को तिलांजलि देकर मोना ने सप्तपदी के लिए अपने कदम आगे बढ़ा दिए।
डॉ मंजू राठी
एमबीबीएस एमडी
एलएलबी एलएलएम
लेखिका ,समाजसेविका और ब्लॉगर।