जीवन दाता



जीवन दाता
अपने पापा की लाडली बिटिया है मंजू । पापा अब 75 वर्ष के हो चुके हैं ।वे अपनी बेटी से बेहद प्यार करते हैं। वह भी अपने पापा से बहुत प्यार करती है । उनकी छोटी सी तकलीफ भी उसे बर्दाश्त नहीं होती है, फिर आज तो उनका ऑपरेशन था। दो दिन से वह बहुत परेशान थी, डॉक्टर जो थी। ऑपरेशन का भला बुरा अच्छे से जानती थी । डॉक्टर होने के बावजूद भी अपने पापा के बारे में सोच कर डर जाती थी। पापा को अनेक मेडिकल प्रॉब्लम्स भी थी और रीड की हड्डी में भी जकड़न थी इसलिए उसे पता था कि भूल देने में तकलीफ आ सकती थी, पर मजबूर थी , ऑपरेशन करवाना जरूरी था। दोनों साइड में हर्निया था और उसमें आते आकर बार-बार फंस रही थी और कभी भी कोई भी बड़ी तकलीफ हो सकती थी, यह वह जानती थी ।अगर कभी आते फंस गई और निकल नहीं पाई तो इमरजेंसी हो सकती थी। सबकुछ जानती थी पर किसी से शेयर नहीं कर सकती थी। अगर किसी को बता देती तो शायद उन्हें भी टेंशन हो जाती। इसलिए डरते हुए भगवान पर भरोसा रखते हुए ऑपरेशन की हामी सभी से करवा ली थी।
कहावत है, बेटा मां का और बेटी बाप की। शायद सही भी है । मैंने तो इस कहावत को सार्थक होते हुए सब जगह पर देखा है। बेटियां बाप को ज्यादा ही प्यारी होती है। मेरी भी एक बेटी है और मुझे पता है वह मुझसे ज्यादा अपने पापा से अपनी सारी बातें शेयर करती है। और उसके पापा भी उसकी हर फरमाइश पूरी करते हैं ,कभी-कभी तो मुझे भी इस बात का पता नहीं चलता। मानती हूं, मुझे डॉक्टर बनाने में पापा से ज्यादा मेरी मां का हाथ था पर फिर भी मैं पापा की लाडो हूं ।पापा मेरी कोई बात टालते नहीं है।
जिंदगी के सफर में ऐसे अनेक मोड़ आते हैं जहां आपको अपनों से दूर होना पड़ता है । बेटियों के साथ भी यही होता है ।मेरे साथ भी यही हुआ ,जमाने की रीत जो है। पहले डॉक्टर की पढ़ाई के लिए और बाद में शादी की वजह से मैं कभी मेरे माता-पिता के पास 10 दिन से ज्यादा नहीं रह पाई। 17 की उम्र में घर छोड़ दिया और उसके बाद हमेशा के लिए पराई हो गई । पर फिर भी यह बाप बेटी का रिश्ता अनोखा था ।उम्र के इस पड़ाव पर पहुंच कर भी पापा का प्यार कम नहीं हुआ था।

आज अपने जीवनदाता की जिंदगी के इस मोड़ पर , उनकी जिंदगी की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले कर उनका यह ऑपरेशन करवाना बहुत ही कठिन था मेरे लिए ।पर करना तो था ही। डॉक्टर थी, जानती थी सब कुछ । डॉक्टर अपने मरीज का जब इलाज करते हैं तो वे बहुत ही सजग और कॉन्फिडेंट होते हैं ।पर जब कभी अपनों के साथ कुछ होता है तो वे नेगेटिव ज्यादा सोचते हैं । मेरे साथ भी यही हो रहा था। मैं पॉजिटिव की जगह नेगेटिव बातें ज्यादा सोच रही थी। सब कुछ अच्छा होगा यह दिल कहता है पर दिमाग में उलटे सीधे विचार आते ही रहते हैं यह एक ह्यूमन टेंडेंसी है । इसीलिए तो ज्यादातर डॉक्टर अपने रिश्तेदारों को इलाज खुद नहीं करते। सब पर विश्वास होता है पर दिल फिर भी घबराता है। पता नहीं क्या होगा? कैसे होगा? सब ठीक तो हो जाएगा ना ?वगैरा-वगैरा।
मेरे साथ भी यही हो रहा था। दो दिन से दिमाग में एक उलझन थी, सब कुछ ठीक हो जाएगा ना ? अपने सारे डॉक्टर दोस्तों से डिस्कशन कर रही थी ।घर वालों को भी समझा रही थी। सब कुछ ठीक हो जाएगा यह दृढ़ विश्वास था। बाकी लोग यह नहीं जानते थे कि क्या तकलीफ आ सकती थी इसलिए उनकी इच्छा थी कि अपने ही शहर में अच्छे डॉक्टर से ऑपरेशन करवा लेते हैं। पापा की भी यही इच्छा थी । पर मैंने इसे स्वीकार नहीं किया क्योंकि मैं जानती थी बेहोशी देने से लेकर ऑपरेशन और ऑपरेशन के बाद के सारे कॉम्प्लिकेशंस के बारे में । इन सारी चिंताओं ने मुझे परेशान कर रखा था और इसीलिए मैंने जहां पर मेरे दोस्त मौजूद हो , ऑपरेशन के दौरान मेरी उनसे बात होती रहे और जिस अस्पताल में सारी सुविधाएं हो उसको चुना।
ऑपरेशन के तीन घंटे हमारे लिए बहुत भारी होने वाले थे। मेरे भाई , मेरी मां और हम सभी बहुत ही टेंशन में थे।मेरी मनोदशा उनसे कुछ अलग थी। शायद मेरे अलावा इसे और कोई समझ भी नहीं पाएगा ,
क्योंकि वे डॉक्टर नहीं है और मैं डॉक्टर हूं , यही फर्क है ।हर एक स्टेप की जानकारी होने से उसके होने वाले नेगेटिव इफेक्ट्स पर ज्यादा ध्यान जा रहा था ।स्वाभाविक था, यह एक मानव फितरत है फिर मैं उससे अपवाद कैसे रह सकती थी।
सुबह पापा से फोन पर बात हो गई ।पापा की आवाज थोड़ी धीमी थी। हमेशा बुलंद आवाज में बात करने वाले पापा की धीमी आवाज सुनकर मेरा दिल वैसे भी बैठ गया। उनके भी मन में डर था । पहली बार वे अस्पताल में किसी ऑपरेशन के लिए भर्ती हुए थे, वह भी इस उम्र में । उनकी भी ऑपरेशन कराने की इच्छा नहीं थी तभी तो एक साल तक इस बीमारी की तकलीफ झेल रहे थे पर अब तो गले तक आ गया था । तकलीफ बढ़ गई थी और ऑपरेशन के अलावा कोई चारा नहीं था ।भाइयों को डर लग रहा था इसलिए उनका भी इस उम्र में ऑपरेशन के बिना होने वाले उपायों की तरफ रुझान ज्यादा था ।पर मैं ही जानती थी अगर ऑपरेशन नहीं करवाया तो कभी भी इमरजेंसी हो सकती थी और उस वक्त और भी कठिनाइयां बढ़ सकती थी और जटिलताएं आ सकती थी और ऐसे में कभी-कभी जान पर भी बन आती है। इसी वजह से आखिर में ऑपरेशन करवाना है इस बात पर मुहर लगा दी गई। पापा का मन ना होते हुए भी अपनी तकलीफ से और मेरे डर से उन्होंने हां कर दी।

यह सत्य है कि जिससे हम ज्यादा प्यार करते हैं उनके लिए हम डरते भी ज्यादा है । मेरा भी यही हाल था। पापा को ऑपरेशन थिएटर में ले जाया गया और मेरा दिल बेचैन हो गया । सुबह-सुबह सभी भगवान को याद कर रही थी ।हनुमान चालीसा भी पढ़ ली ।आप सोचेंगे डॉक्टर होकर भी यह सब किस लिए ? डॉक्टर का हमेशा अपने विश्वास के साथ साथ एक अदृश्य ताकतपर विश्वास रहता है जिसे कोई भगवान कहता है तो कोई और कुछ ।और उसी की बदौलत वह सब का इलाज आसानी से कर पाता है। मैं डॉक्टर थी तभी तो यह सब कर रही थी । एक विश्वास होना जरूरी था । किसी पर विश्वास करके अगर कोई काम किया जाए तो उसके पूरे होने के चांसेस ज्यादा होते हैं । डॉक्टर होने के नाते सब भले बुरे का ज्ञान था और इसीलिए ऊपर वाले पर विश्वास जरूरी था ।कभी-कभी ज्ञान से ज्यादा अज्ञानी होना अच्छा होता है यह मेरी समझ में आ रहा था लेकिन अब मैं अज्ञानी नहीं बन सकती थी ,यही तो मेरी सबसे बड़ी कमजोरी थी।

ऑपरेशन रूम की सारी बातें मैं जानती थी ।मरीज से अच्छे से बात की जाती है ,उन्हें वहां क्या होता है और उनके साथ क्या करेंगे इसकी सारी जानकारी दी जाती है ।मरीज को टेंशन होती है और डॉक्टर उस टेंशन को दूर करने का यत्न करता है ताकि उसका मरीज रिलैक्स रहे। पापा के साथ भी यही हुआ ।उन्हें पीठ में इंजेक्शन लगाने की प्रक्रिया की जानकारी दी गई । चार बार कोशिश करने के बाद भी पीठ में इंजेक्शन लगने की प्रक्रिया सफल नहीं हुई तो पूरा बेहोश करने की प्रक्रिया शुरू की गयी और उसके साथ ही मेरा दिल घबरा गया। पापा की गर्दन में जकड़न की वजह से श्वास नली में ट्यूब डालना मुश्किल होगा यह मैं जानती थी। भगवान से प्रार्थना कर रही थी कि सब कुछ ठीक हो जाए। डॉक्टरों की मेहनत और ऊपर वाले की मेहरबानी से बेहोशी की प्रक्रिया शांति से हो गई । ऑपरेशन शुरू हो गया। मन में डर तो था पर सब ठीक चल रहा था इसलिए दिल शांत था ।
मेरा मन किसी भी चीज में नहीं लग रहा था। बार-बार नजरें घड़ी की तरफ उठ रही थी ।एक एक पल युगो जैसा लग रहा था । सर्जरी में वक्त लगेगा यह मालूम होने के बावजूद मन बेचैन था। ऐसे लग रहा था कि सर्जन इतनी धीरे सर्जरी कैसे कर रहे हैं । पर मेरा यह सोचना मेरी बेचैनी और मेरे उतावलेपन की वजह से था । मेरा यह सोचना लाजमी भी था एक बेटी के नाते पर एक डॉक्टर के नाते यह सोचना गलत था ।यहां में बेटी ज्यादा थी और डॉक्टर कम थी यह मैं जानती हूं । दो घंटे बीत गए । सर्जरी पूरी हो गई और पापा को रिकवरी रूम में लाया गया। पापा होश में थे लेकिन थोड़ा नींद में थे । मैंने फोन से वीडियो कॉल किया। पापा ने मुझे देखा और उस अर्ध बेहोशी में भी हल्का सा मुस्कुरा दिए । वह पल मेरे लिए एक अनोखा, अद्भुत अहसास था। जिंदगी में शायद बहुत कम बार मैंने ऐसा महसूस किया था । जीवनदाता का वह हल्का सा मुस्कुराना मेरा सारा टेंशन खत्म कर गया। मन शांत हो गया। मन में चल रही कशमकश दूर हो गई । दिमाग में चल रहे हजारों सवालों के जवाब मिल गए ।अनायास ही दुआ में हाथ जुड़ गए और दो बूंदे आंखों से गालों पर सरक आई।
डॉ मंजू राठी।
एमबीबीएस एमडी ।
एलएलबी एलएलएम।
ब्लॉगर ,लेखिका ।


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