दोस्तों का खजाना — बचपन की यादें

दोस्तों का खजाना

दोस्तों का खजाना इस पुस्तक से ली गई पहली कहानी यहां पर पोस्ट की जा रही है ।आपके सुझाव हमारे लिए बेहद उपयोगी रहेंगे, तो प्लीज अपने कमेंट्स हमें जरूर दीजिए।

बचपन की यादें

मैं अरूण एक बिजनैसमेन हूं। दिल्ली में रहता हूँ। लोग कहते है- दिल्ली ऐसी जगह है जहाँ लोगों के पास वक्त ही नहीं होता। उनकी जिन्दगी, उनका घर और ऑफिस के इर्द गिर्द ही रहती है। वक्त के नाम पर वे अपने क्लाइंट के साथ चाय पी लेगें या फिर ऑफिस में ही काम के सिलसिले में कुछ इधर-उधर की बातें कर लेंगें । बस, यही उनका एंटरटेनमेंट है। इसके अलावा घर और घर में क्या है? या तो टी. वी. के सामने बैठ जाते है या फिर लॉन में अकेले बैठे-बैठे चाय की चुस्कियाँ , कभी-कभी एखाद पैग लेकर घंटो बैठे रहते हैं या फिर मोबाईल पर लगे रहते है। कोई बात करने वाला नहीं, सब अपने-अपने काम में व्यस्त रहते हैं। पडोसियों को भी किसी से मतलब नहीं होता। कहा जाये तो अपने पडोसी कौन है यह भी आपको पता नहीं होता। आपके बगल वाले फ्लैट में कौन रहता है, आपके ऊपरवाले फ्लैट में कौन रहता है, आपके आगे किसका मकान है? कुछ पता नहीं होता।

एक जमाना था जब पूरे मोहल्ले का बायोडेटा सबके पास होता था। कौन कहाँ रहता हैं, किसके घर में कितने लोग है, कौन क्या काम करता है? कहाँ से आया है? क्या खाता है, क्या पीता है, सबकुछ सभी जानते थे। अपने मोहल्ले के अलावा पूरे एरिया के लोगों से जान पहचान होती थी और अब कुछ ही सालों में यह हो गया है कि किसी मित्र के घर जाना है तो भी पहले अपॉयमेंट लेनी पड़ती है। एक वो वक्त था जब आधी जिन्दगी दोस्त के घर पर ही निकलती थी। अक्सर खाना-पीना वही होता था। ना तो उनके माँ-बाप को कोई कष्ट होता था और ना ही कोई फिक्र रहती थी। सबकुछ स्पष्ट रहता था। कुछ छुपाने जैसा नहीं होता था।

अरूण, आज काफी उदास था। उदासी का कारण वह भी नहीं जानता था। पर उसको कुछ अच्छा नहीं लग रहा था। वह ऑफिस से भी आज जल्दी घर आ गया था। घर आया तो नौकरानी से पता चला कि बीवी किसी के घर किटी पार्टी में गयी है। बच्चे कॉलेज के बाद अपने दोस्तों के साथ कहीं गये है। घर में वो और उसका प्यारा कुत्ता ‘मार्शल’ और नौकरानी है। यह देखकर वह और उदास हो गया। उसे उदास देखकर मार्शल को भी अच्छा नहीं लगा। और वह उसके आगे-पीछे घुमने लगा और अपनी दूस हिलाते हुए गुरे गुर्र की आवाज में पूछने लगा, “आपको क्या हुआ है? अरूण ने काफी देर तक तो उसकी तरफ ध्यान हीं नहीं दिया पर जब वह थोड़ा तेज आवाज में गुरनेि लगा तो उसने मार्शल की तरफ देखा । उसकी आँखों में एक अजीब-सा अपनापन था। अपने मालिक को उदास देखकर वह परेशान हो गया था । जब अरूण ने उसके सर पर प्यार से हाथ फेरा तो वह एकदम से उछलकर भाग गया और कोने में रखी अपनी बॉल को मुँह में दबाते हुए वापस आकर दुम हिलाने लगा। अरूण समझ गया, वह क्या चाहता है। अरूण उसकी तरफ देखकर मुस्कुराया और बोला, “रुक, अभी चलते हैं। मैं कपडे बदल लूँ, फिर खेलते हैं।”

आज्ञाकारी बच्चे की तरह वह चुपचाप बॉल को चाटता हुआ एक छिपकली की तरफ फर्श पर चिपककर बैठ गया। उसकी यह हरकत देखकर अरूण को हँसी आ गयी। अरूण ने अपना पसंदीदा कुरता पाजाना पहना। मुँह धोया और नौकरानी को आवाज लगाते हुऐ बाहर आ गया। मार्शल तो पहले ही दौड़कर बाहर आ चुका था।

अरूण लॉन में टहलने लगा और मार्शल उसके पिछे पिछे। लॉन में इधर-उधर बिखरे हुए मार्शल के खिलौनों को वह लात मारकर दूर फेंकता और मार्शल तेजी से उनकी तरफ दौड़ता और उन खिलौने को लाकर अरूण के पांव के पास छोड़ देता। अरुण फिर उसे दूर फेंक देता। इस खेल में दोनों को ही मजा आ रहा था तभी नौकरानी ने चाय का ट्रे लाकर मेज पर रख दिया।
“सर! चाय।” उसने कहा।
“लक्ष्मी, आज शाम को खाने में क्या बनेगा?” अरूण ने कप हाथ में लेते हुए
पूछा।
“सर, मैडम ने तो मना कर दिया कि वह कुछ नहीं खायेगी और बच्चों ने कहा उन्हें आने में देर हो जायेगी और वे बाहर से ही खाना खाकर आयेंगे। सिर्फ आपके लिए ही खाना बनाना है। कहिए सर, आपके लिए क्या बनाऊँ?” उसने कहा।

‘अच्छा!” एक लम्बी सांस लेते हुए अरूण ने कहा, “सिर्फ मैं ही खाने वाला हूँ।

“जी सर!” उसने सिर झुकाकर कहा।

लक्ष्मी उसके जवाब का इन्तजार कर रही थी।
उसने केटल से चाय कप में उंडेली,उसका एक सिप लेते ही उसे मजा आ गया।

“लक्ष्मी, आज चाय में अलग स्वाद है! आज मेरे टेस्ट की चाय बनी है। “

“जी सर! आज मैडम नहीं है ना, तो मैंने आपके टेस्ट वाला चाय मसाला डाल दिया।” लक्ष्मी ने नजरे झुकाकर कहा।

‘वाह लक्ष्मी! बहुत अच्छा किया। अब बता मेरे पसंद के हिसाब से खाने में क्या बनायेगी।” अरूण ने बड़े ही प्यार से पूछा।

‘आप जो कहो सर, मैं वह बना दूंगी।” लक्ष्मी ने अरूण की तरफ देखते हुए कहा।

अरुण चाय की चुस्कीयाँ लेता रहा। लक्ष्मी वहीं खड़ी खड़ी उसके जवाब का
इन्तजार करने लगी। चाय खत्म करके कप मेज पर रखते हुऐ उसने कुछ सोचते हुए, कहा, “लक्ष्मी, आज मौसम अच्छा है, शायद बारिश आने वाली है, कुछ गरमागरम खाने का मन कर रहा है।”

‘आप बताइये सर, क्या बनाऊँ? पकौड़े बनाऊँ?” उसने मासूमियत से पूछा।

अरूण कुछ सोचने लगा, फिर एकदम से मन में कुछ बोला, “लक्ष्मी सून, एक काम कर- तू आलू उबाल ले, और सामने वाली डेयरी से बड़ी
वाली ताजा ब्रेड ले आ।”

‘आज ब्रेड रोल बनाते हैं। और हाँ, आज मैं बनाऊँगा। तू आलू छिलने के बाद मुझे बुला लेना।”
लक्ष्मी आश्चर्य से अपने मालिक की तरफ देखने लगी। उसने कभी मालिक को किचन में काम करते हुए नहीं देखा था। मालिक तो हमेशा जो बनता बिना कुछ कहे ही खा लेते थे और आज वो खुद बनायेंगे? वह वहीं खड़ी खड़ी आश्चर्य से अरूण की तरफ देख रही थी।

” अरे ! तू अभी तक यही खड़ी है, जा ना अब, जोर से भूख लग रही है। जल्दी से तैयारी कर ।” अरूण की आवाज सुनकर वह एकदम से हड़बड़ा गयी, उसे इस तरह हड़बड़ाते हुए देखकर अरूण ने कहा, ” अब जा ना, जा, तैयारी कर ।”

” जी सर ! ” कहते हुए वह वहाँ से भाग छूटी। लक्ष्मी चली गयी। अरूण वही बैठा-बैठा कुछ सोच रहा था। मार्शल गार्डन में अपने खिलौनों के साथ इधर-उधर दौड़ रहा था।

अरूण को अपना बचपन याद आ गया। वे चार भाई-बहिन थे। अरूण तीसरे नंबर का था। सबसे छोटी बहन और दो बड़े भाई। चारों अपने माँ-बाप और दादी के साथ रहते थे। दादाजी का देहांत जब वे छोटे थे तभी हो गया था। सारी घर की जिम्मेदारी उनके पापा ने उठा ली थी। मिडिल क्लास फैमिली से होते हुए भी उसने कभी कोई कमी महसूस नहीं की थी। वे फ्लैट में रहते थे। आस-पड़ोस बहुत अच्छा था। सब मिल जुलकर रहते थे। त्योहार साथ में मनाते थे। पिकनिक पर जाते थे, कभी फैमिली के साथ तो कभी बच्चे-बच्चे। कभी कोई पार्टी तो कभी कोई प्रोग्राम ।छुट्टीयों का सबको इन्तजार रहता था। स्कूल शुरू होने से पहले प्री-मानसून की बारिश जब आती थी तो हमेशा घर में ब्रेड रोल बनते थे, घर वालों के साथ-साथ पड़ोसियों के लिये भी । और लॉन में बैठकर सब मस्ती में उनका स्वाद लेते हुए तारिफों के पुल बांध देते थे। हम चारों भाई-बहिन को माँ की मदद करनी होती थी, तभी तो पूरे अपार्टमेंट के लिए ब्रेड-रोल बन पाते थे। दोपहर से ही हम इस काम में लग जाते थे और शाम को सभी के घर आने के बाद ब्रेड-रोल पार्टी होती थी और उस वक्त जो खुशी का माहौल होता था उसे जुबां में बयान करना मुश्किल था।

आज अरूण को इतने सालों बाद उन ब्रेड़-रोल की याद आ गयी थी। इतने साल में ऐसी भी कोई डीश होती है, यह भी उसके स्मरण पटल से विस्मृत हो गयी थी। बचपन के दिन ताजा हो गये थे। सुबह से उसके मन पर छायी हुयी उदासी गायब हो गयी थी। उसके शरीर में एक अजीब सी स्फूर्ति आ गयी थी। उसका मन उसकी बचपन की यादों में हिलौरे खा रहा था। उसका अपना घर, वो मोहल्ला, वो गलियाँ सबकुछ तो एक साथ उसके दृष्टिपटल पर सैर कर रहे थे। वह उन बचपन की यादों में अपने आप को देखकर मुस्कुरा रहा था।

मार्शल खेलकर थक गया था। वो उसके पाँव के पास आकर बैठ गया था। आज उसे मार्शल पर भी बहुत प्यार आ रहा था। उसके सर पर हाथ फेरते हुए ट्रे में रखे हुए बिस्किट उसे खिलाते हुए उसने कहा,

“पता है मार्शल, बरसों बाद आज मैं ब्रेड़-रोल बनाऊंगा। देखा, आज भी वैसा ही मौसम हो रहा है। शायद चंद मिनटों में बारिश शुरू हो जाये। तू खायेगा ? तेरे लिए बिना मिर्ची का बनाऊँगा खायेगा ना!” मार्शल ने अपने कान खड़े करके शायद सबकुछ समझ में आ गया हो इस तरह अपनी स्वीकृति दे दी। तभी लक्ष्मी ने आवाज दी,
“सर, सारी तैयारी हो गयी है।”

अरूण उठकर जाने लगा तो मार्शल भी उसके पीछे-पीछे चल दिया। अरूण सीधा किचन में घुस गया और मार्शल किचन के गेट के सामने पसर गया और अपने मालिक को किचन में काम करते हुए आश्चर्य से देखता रहा।

अरूण ने कुछ पल के लिए आँखें बंद की शायद कुछ याद कर रहा हो और फिर लक्ष्मी को ऑर्डर देने लगा, “लक्ष्मी ये मसाले निकाल दे, बारीक-बारीक प्याज काट दें, हरी मिर्च काट दें, लहसुन छील दें।” लक्ष्मी ने सारे मसाले निकाल दिये, बाकी कार्य भी कर दिए। उसने आलू को हाथ से पिसा। अपनी याददाश्त को स्ट्रांग करते हुए माँ ने सिखाये थे जैसे के जैसे सारे मसाले उसमें डालकर छोटी-छोटी गोलियाँ बना दी। फिर ब्रेड़ की किनारे हटाने के बाद उसे हाथ में रखकर पानी में भिगोने के बाद सारा पानी दबाकर निकाल दिया और उसमें एक आलू की गोली रखकर शानदार तरीके से ब्रेड रोल बनाये और एक थाली में सजाकर रख दिये।

हाथ धोते हुए लक्ष्मी से कहा, “लक्ष्मी, कढ़ाई में तेल लेकर उसे गैस पर चढा
दे।” तभी डोअरबेल बजी।

“लक्ष्मी, तू देख कौन है, मैं ही तेल चढ़ा दूंगा।” कहते हुए उसने कढ़ाही में तेल ठंडेल दिया। लक्ष्मी चली गयी। कुछ देर तक लक्ष्मी नहीं आयी तो गैस की फ्लेम को कम करके वह बाहर आ गया। उसने देखा, कोई मेहमान आये हैं जिन्हें लक्ष्मी ने ड्रॉइंगरूम में बिठा दिया है।
“कौन है लक्ष्मी” उसने बाहर आते हुए आवाज दी।

“सर जी, यह अपने नये पड़ोसी है। कुछ दिन पहले ही अपने बगल वाले बंगले में रहने आये है।” लक्ष्मी बोलते हुए किचन में चली गयी।

“अच्छा!” दीर्घ श्वास लेते हुए अरूण ने कहा । माथे पर सलवटे आ गयी। “ये क्यों आये है? ” मन में कहा। पर अब तो मिलना ही पड़ेगा। चेहरे पर जबरदस्ती मुस्कुराहट लाते हुए वह ड्रॉइंगरूम की तरफ बढ़ गया। अरूण जैसे ही अंदर आया, वे लोग खड़े हो गये। उन्होंने हाथ जोड़कर” ‘नमस्ते'” की। अरूण ने भी हाथ जोड़ दिए और उनको बैठने का इशारा करते हुए खुद भी एक सोफे के कोने में धंस गया।

अरूण ने प्रश्न भरी नजरों से उनकी तरफ देखा। वे समझ गये अरूण क्या कहना चाहता है। इतने में लक्ष्मी पानी ले आयी। ट्रे रखकर वह चली गयी। “लिजिए, पानी लिजिए”, अरुण ने कहा।

पानी का गिलास हाथ में उठाते हुये, उन्होंने कहा, “मैं लोकेश शर्मा, केमिकल इंजीनियर हूँ। मेरी कंपनी ने यहाँ एक प्रोजेक्ट लाँच किया है। उसी के सिलसिले में मैं सूरत से यहाँ दिल्ली आया हूँ। अब कुछ साल यही रहना है। कुछ दिन पहले इस बंगले में शिफ्ट हुये हैं। “

“यह मेरी वाईफ है, ‘शिल्पी’ और ये मेरे बच्चे ‘महक और मानव’ “उन्होंने अपनी फैमिली की तरफ इशारा करते हुए कहा।

अरूण ने मुस्कुराते हुए उनका अभिवादन किया। अरूण की नजरों में अभी भी प्रश्न था। उसे भौंपते हुए लोकेश ने कहा,

“हमें यहाँ आये कुछ दिन हो गये थे पर आस-पड़ोस में कौन है, यह हम नहीं जानते थे तो सोचा, आप लोगों से मुलाकात की जायें, इसलिए चले आयें।”

” अच्छा किया।” अरूण ने संक्षिप्त में जवाब दिया। अभी भी अरूण को उनके आने की खुशी नहीं थी।

वह अभी भी उन्हें बिन बुलाये मेहमान ही समझ रहा था , उसकी उलझन को भाँपते हुए लोकेश ने कहा,
‘मुझे पता है आप अरूण जी है। आप एक बिजनैसमेन है। आपकी फैमिली के बारे में मुझे कुछ-कुछ जानकारी है। मैं थोड़ा सोशल किस्म का इंसान हूँ। जहाँ भी जाता हूँ अपने नये-नये दोस्त बनाने की कोशिश करता हूं। खासकर अड़ोसी -पड़ोसी की जानकारी होना जरूरी होती है। दुःख-सुख में रिश्तेदारों से ज्यादा आस-पड़ोस ही काम आता है। यह मेरा अनुभव है।” अरूण को पता नहीं क्यों यह इंसान दिलचस्प लगा। उसे भी अकेलेपन से
बोरियत हो गयी थी तो सोचा, अच्छा है। आज इसके साथ ही कुछ गपशप कर लेते हैं।

“मुझे नहीं पता था- आप यहाँ रहने आये हो।” अरूण ने सकुचाते हुए कहा। वो थोड़ा-सा गिल्टी भी महसूस कर रहा था, क्योंकि उसे अपने पड़ोस में कौन आया और कौन गया इसका भी पता न था। एक वो वक्त था, जब उसे सभी के बारे में सब कुछ पता होता था और आज ये वक्त है।

‘अच्छा, क्या लेंगें आप।” अरूण ने शिष्टाचार के नाते पूछा। “
‘कुछ नहीं। हम तो सिर्फ “हाय-हैलो” करने आये थे।” इस बार उसकी पत्नि
ने जवाब दिया। “भाभीजी कहीं नजर नहीं आ रही?” इधर-उधर नजरें दौड़ते हुए शिल्पी ने पूछा।
“ओह ! वो – वो कहीं बाहर गयी है. अभी आती ही होगी।”

“लक्ष्मी, सबके लिए कॉफी बनाना प्लीज।” अरूण ने लक्ष्मी को आवाज लगाई।
” आपके बच्चे भी नजर नहीं आ रहे, मैंने सोचा, बच्चों से भी उनकी दोस्ती करवा दूँ ताकि नये शहर में उनका मन जल्दी लग जाये।” बच्चों की तरफ देखते हुए लोकेश में कहा।

“सॉरी, आज मैं घर पर अकेला ही हूँ। सभी बाहर गये हैं। अगली बार मैं खुद इन्हें बच्चों से मिलवा दूंगा।” महक और मानव की तरफ देखते हुए अरूण ने कहा।
“अच्छा, हम चलते हैं, फिर मिलते रहेंगें। आपको डिस्टर्ब कर दिया।” लोकेश ने उठते हुए कहा।

अरूण को थोड़ा बुरा लग रहा था की, घर में मेहमान आये हैं और उसके अलावा घर में कोई नहीं है। अपने आप को संभालते हुए उसने मुस्कुराते हुए कहा, “लोकेश जी, आज मौसम अच्छा है, आप भी फ्री हैं, और मैं भी, तो क्यों न ये शाम हम यहीं बिताये।”
शिल्पी ने प्रश्नसूचक दृष्टि से लोकेश की तरफ देखा। अरूण समझ गया। कहने लगा, “देखिए भाभीजी, इस वक्त मेरी श्रीमती जी तो नहीं है आपको कंपनी देने के लिए पर यकीन मानिए- आप बोर नहीं होगी।”
” अच्छा।” इस बार लोकेश ने कहा और सभी खिलखिलाकर हँस पड़े। वहाँ का माहौल अच्छा हो रहा था। तभी लक्ष्मी आकर वहाँ खड़ी हो गयी।

“सर, वो…. वो….।” वो कहते-कहते रूक गयी।

‘अरे हाँ लक्ष्मी, मैं तो भूल ही गया, वो तेल गैस पर चढ़ा हुआ है और मैं यहाँ बैठे गप्पे लगा रहा हूँ।” उसने उठते हुए कहा। वो किचन की तरफ जाने के लिए मुड़ा ही था की, एकदम कुछ याद करते हुए बोला,
“लोकेश जी भाभीजी, आप पाँच मिनिट बैठिए और फिर देखिए मैं आपके लिए गर्मागर्म ब्रेड रोल बनाकर लाता हूँ।” जवाब का इन्तजार किए बिना ही अरूण किचन की तरफ बढ़ गया।

सभी मेहमान एक-दूसरे की तरफ देखते रहें। उनकी समझ में कुछ भी नहीं आया। कुछ देर वे उनके घर को निहारते रहे। बड़ा ही खूबसूरत घर था। काफी सजा हुआ था। अमीरी की छटा उसमें झलक रहीं थी। वे आपस में ऐसे ही गपशप कर रहे थे, इतने में ही अरूण बाहर आ गया। उन्हें देखकर उसने मुस्कुराते हुए कहा,

“सॉरी, आपको अकेला छोड़ दिया।”

“क्या आप कुकींग करना पसंद करते है?” इस बार शिल्पी ने कहा।

“नहीं! आज बरसों बाद किचन में गया हूँ। बचपन की यादें ताजा करने। ” अरूण ने बड़े ही स्पष्टता से कहा।

‘अंकल, पापा तो कुकिंग मास्टर है।” इसबार महक ने कहा।

‘अच्छा! फिर तो कभी इनके हाथों का स्वाद चखना पड़ेगा।” हँसते हुए अरूण ने कहा।

“श्योर।” लोकेश ने कहा।

” अच्छा, मानव और महक मौसम अच्छा हो रहा है, चलो, तुम लोगों को हमारा गार्डन दिखाते है और वहीं बैठकर ब्रेड रोल का स्वाद लेते है।” अरूण ने बच्चों की तरफ देखते हुए कहा।
सभी उठ खड़े हुए। अरूण आगे-आगे और बाकी सब उसके पीछे-पीछे गार्डन में आ गये।

“वाव ! कितना सुन्दर गार्डन है।” महक ने चहकते हुए कहा। पर जैसे ही उसकी नजर मार्शल पर पड़ी वह अरूण के पीछे छुप गयी।
मार्शल गुर्राकर उठ खड़ा हुआ और दौड़ता हुआ उनकी तरफ आने लगा, तभी अरूण ने जोर से कहा,

“मार्शल, नो!” और उसके पाँव को वही ब्रेक लग गये। वह मुँह से अजीब-सी आवाज निकालते हुए उन चारों को घूर रहा था। पहले अरुण ने उसको पुचकारा और फिर कहा, “मार्शल, गो एण्ड सीट” और एक आज्ञाकारी बच्चे की तरह वह उसके पैरों के पास आकर बैठ गया।

‘आइये, बैठिये।” उसने कुर्सियों की तरफ इशारा करते हुए कहा। सभी बैठ गये। इतने में मार्शल फिर उठ खड़ा हुआ और कभी अजनबियों की तरफ तो कभी अरूण की तरफ देखने लगा। अरूण समझ गया।

” महक और मानव” उसने दोनों बच्चों को कहा, “वो तुम्हारे साथ खेलना चाहता है। जाओ खेलों।” उन दोनों को भी उसके साथ खेलने का मन हो रहा था। दोनों झट से उठ गये और मार्शल के साथ उसके खिलौने के साथ-साथ फुटबाल से भी खेलने लग गये। उन्हें बडा मजा आ रहा था। इतने में लक्ष्मी वहाँ पर कॉफी और ब्रेड रोल ट्रे में सजाकर ले आयी। वाकई मस्त खुशबू आ रही थी। सारा गार्डन महकने लगा।

अरूण ने बच्चों को आवाज लगायी और लक्ष्मी ने सभी को ब्रेड रोल सर्व कर दिये।
” वाह! क्या बात है! अमेजिंग।” पहला ग्रास मुंह में डालते हैं लोकेश ने कहा।
“वाकई, बहुत टेस्टी है।” इस बार शिल्पी ने कहा।
“वाउ ! इट्स सो टेस्टी।” दोनों बच्चों ने भी चहकते हुए कहा। मार्शल सभी की तरफ देख रहा था। तभी लक्ष्मी ने उसके लिए लायी हुयी ब्रेड उसे दे दी। वह ब्रेड मुँह में दबाकर अपनी फिक्स जगह पर जाकर बैठ गया और स्वाद ले लेकर उसे खाने लगा। बच्चें उसकी हरकते देखकर खुश हो रहे थे।

अरूण ने सभी को फोर्स करते हुए पेट भर ब्रेड रोल खिलाये और फिर कॉफी का दौर शुरू हो गया। सभी ने अरूण के ब्रेड रोल की खूब तारीफ की। अरूण को भी विश्वास नहीं हो रहा था की, इतने सालों बाद भी वह ब्रेड रोल बनाना भूला नहीं था।

वह आज बहुत खुश था। उसकी पुरानी यादें ताजा हो आयी थी। उसका मन हल्का हो गया था।

काफी देर हो गयी थी। लोकेश और शिल्पी ने अब अरूण से विदा लेनी चाही।
‘भाई साहब, अब हम चलते हैं। आपसे मिलकर अच्छा लगा। पर भाभीजी से मुलाकात नहीं हो पायी।” शिल्पी ने हाथ जोड़कर विदा लेते हुए कहा ।

‘कोई बात नहीं। कभी हम इन्हें अपने यहाँ आमंत्रित करेंगे।” इस बार लोकेश ने कहा।

” श्योर !” अरूण ने कहते हुए अपने हाथ जोड दिए। वे सभी चले गये। अरूण अपनी बचपन की यादों में फिर से खो गया तभी डोअरबेल बजी और कुछ ही पल में अरूण की श्रीमतीजी ने घर में प्रवेश किया।

” बहुत अच्छी खुशबू आ रही है” घर में घुसते ही रचना ने कहा। ” लक्ष्मी, क्या बनाया है तुमने!” कहते हुए रचना किचन की तरफ बढ़ने लगी तभी उसकी नजर अरूण पर पड़ी और वह वही ठिठक गई।

” अरे अरूण! आप कब आये? आप तो आज लेट आने वाले थे ना। इसलिए मैंने बाहर जाने का प्लान बना लिया। आय एम सॉरी।” रचना ने अरूण के पास सोफे पर बैठते हुए कहा।

“कोई बात नहीं। आज ऑफिस में मन नहीं लग रहा था, तो जल्दी घर आ गया पर यहाँ तो कोई था ही नहीं।” अरूण ने रचना की ओर देखते हुए कहा।

‘आय एम सॉरी, तुम एक कॉल तो कर देते। मैं जल्दी आ जाती।” रचना को थोड़ा-सा गिल्टी फिल हो रहा था।

“अरे, कोई बात नहीं। मैंने आज बहुत एन्जाय किया।” अरूण ने हँसते हुए कहा।

“अच्छा! ऐसा क्या किया? और घर में इतनी अच्छी खुशबू किसकी आ रही है?’ रचना ने अपनी नाक को ऊँची करते हुए सूँघने की कोशिश की।

“आज मैंने ब्रेड रोल बनाये।” अरूण ने धीरे से कहा।

“व्हॉट!” रचना आश्चर्य से सोफे पर उछल पड़ी। अरूण ने अपनी नजरें झुका ली ।
“रियली!” उसे अभी भी आश्चर्य हो रहा था। वह आश्चर्य से उसकी तरफ देख रही थी।

” शादी के बाद एक-दो साल तक तो तुम हमेशा वीक एण्ड पर ब्रेड रोल बनाया करते थे पर जब से बिजनैस में व्यस्त रहने लगे- सब छुटता गया। आय लव योर ब्रेड रोल।”
“मैं खाना खाकर आयी हूँ पर फिर भी ब्रेड रोल जरूर खाऊँगी।” कहते हुए रचना किचन की तरफ जाने लगी।

” रचना, तुम चेंज करके आ जाओ। मैं तुम्हारे लिए ब्रेड रोल बनाता हूँ।”

‘आर यू श्योर?” रचना ने पूछा। “यस डियर।” अरूण ने कहा।
अरूण का आज का अंदाज देखकर रचना को अपने शादी के दिन याद आ गये। जब वह नयी-नयी शादी होकर आयी थी तब अरुण और उसके घरवाले उसका कितना ख्याल रखते थे। उसकी हर इच्छा अरूण बिना कहे ही जान जाता था। वे कितने खुशकिस्मत थे- जब पूरा परिवार साथ रहता था। एक भरा पूरा परिवार था पर जैसे-जैसे वक्त बितता गया, सब बिखरता गया । कोई नौकरी के बहाने, कोई व्यवसाय के बहाने तो कोई और कारण से घर छोड़कर दूसरी जगह बसते गये और एक भरा-पूरा परिवार बिखरता गया । ऐसा नहीं की मैं अभी खुश नहीं हूँ। खुश हूँ पर वो सुकून नहीं।
अरुण अपने व्यवसाय में व्यस्त रहने लगे। मैं बच्चों से फ्री हो गयी। बच्चे बड़े हो गये और दोस्तों की कमी और खाली वक्त को बिताने के लिए मुझ जैसी औरतों ने किटी ग्रुप बना लिया। इन ग्रुप में कुछ वक्त तो बीत जाता है पर वो अंतरंग मित्र नहीं मिलते जिनकी हमें तलाश होती है। इसलिए कभी-कभी लगता है,

“कुछ भी खो जाये
कभी खुद को मत खोना।”

आज अरूण- पहले वाला अरूण वापस आ गया है।

रचना चेंज करके बाहर आ गयी तब तक ब्रेड रोल चटनी के साथ टेबल पर लग चुके थे। रचना को सब्र नहीं था और उसने झट से एक ब्रेड रोल उठाया, थोड़ी सी फूंक मारी और गरमागरम ही मुँह में डाल दिया। वह कुछ ज्यादा ही गर्म था की उसे मुँह खोलकर ठंडी सांस लेनी पड़ी। उसकी ये हरकत देखकर अरूण जोर-जोर से हँसने लगा। रचना ने पहला ब्रेड रोल झट से खत्म किया और उसके बाद ही मुस्कुराते हुए बोली,
“वाह! मजा आ गया।”

“यू आर ग्रेट। अभी भी वो ही टेस्ट है।”

अरूण मुस्कुरा दिया। तभी बच्चे भी आ गये। मम्मी-पापा को इस तरह बैठे हुए देखकर वो भी वहीं रूक गये।
“पापा! आपने बनाये है? ” ब्रेड रोल की प्लेट पर नजर पड़ते ही दोनों बच्चों ने एक साथ कहा।

“वाव !” कहते हुए दोनों ने ही उन ब्रेड रोल पर अपना हाथ साफ करना शुरू कर दिया।

“कहाँ थे तुम लोग अभी तक।” अरूण ने पूछा।

“सॉरी पापा, एक दोस्त के यहाँ पार्टी थी तो आने में देर हो गयी।” इस बार बेटी ने कहा।

“इट्स ओके। पर तुम लोग तो खाना खाकर आये होंगे ना। फिर ये ब्रेड रोल क्यों?” अरूण ने मुस्कुराते हुए कहा।

“हाँ….. खाना तो खाया था पर वापस भूख लग गयी।” इस बार बेटे ने कहा और सभी खिलखिलाकर हँस पड़े। बहुत दिनों बाद चारों एक साथ बैठकर इस तरह गपशप कर रहे थे। अरूण को आज बहुत अच्छा लग रहा था। वह मन ही मन कुछ सोच रहा था।

तभी उसने कुछ याद करते हुए कहा,

” अरे हाँ! अपने पड़ोस में कोई नया परिवार रहने आया है।”

“हाँ एक दो बार ‘हाय-हैलो’ ‘हुयी थी।” इस बार रचना ने कहा।

” आज वो अपने घर आये थे।” अरूण ने कहा।

“अच्छा। ” एक साथ तीनों ने कहा।

” घर पर कोई नहीं था तो मैंने ही उन्हें कंपनी दी।”

“ओह! सो सॉरी।” इस बार रचना ने अपनी नजरें झुका ली।

” अच्छे लोग हैं। मेल-जोल बढ़ाना चाहिए। तुम बच्चों, उनके बच्चों के साथ दोस्ती कर सकते हो।”” अच्छे बच्चें हैं वो।” उसने बच्चों की ओर देखते हुए कहा।

” श्योर पापा।” बच्चों ने कहा।

” अच्छा मॉम थक गये हैं, सोने जाये?”

ब्रेड रोल खत्म करते हुए बच्चों ने कहा और पापा के पास आकर “थैंक्स पापा बहुत टेस्टी थे।” कहते हुए बेटी ने पापा को एक झप्पी दे दी।

“ओ. के. गुड नाईट।” कहते हुए बच्चे चले गये।

“अच्छा, चलें।” अरूण ने भी वहाँ से उठते हुए कहा । रचना चुपचाप उसके पीछे-पीछे चल दी। उसके दिमाग में अभी भी कुछ देर पहले का सीन चल रहा था। आज काफी अर्से बाद पूरा परिवार एक साथ ऐसे बैठा था। उसे बहुत अच्छा लग रहा था।

डॉ मंजू राठी
एमबीबीएस/ एमडी
एलएलबी/ एल एल एम
लेखिका, ब्लॉगर

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