
कहने को तो हम मार्बल नगरी में रहते हैं। किशनगढ़ का नाम मार्बल नगरी के नाम से विख्यात है। मार्बल का मतलब संगमरमर जो चमकता हुआ पत्थर है। इस विख्यात मार्बल नगरी का यह हाल देखकर सर शर्म से झुक जाता है ।अगर हमारे यहां कोई मेहमान आना चाहता है तो हमारी नजरें झुक जाती है ।हम चाहते हैं कि वह यहां नहीं आएं या फिर हम सादगी से उन्हें कह देते हैं कि अभी आप मत आइएगा, अगर आप आओगे तो हमारे घर तक शायद पहुंच ही नहीं पाओगे।
इन कुछ वर्षों में ऐसा क्या हो गया? हम इतने मजबूर हो गए क्या? किसी ने हमें मजबूर किया है या हम अपना अधिकार ,अपना हक मांगना भूल ही गए हैं ? या हमारे भी कोई अधिकार होते हैं यह हमें पता ही नहीं है?
जागो, जनता जागो।
किशनगढ़ मार्बल नगरी की हालत तो किसी गांव या ढाणी से भी बदतर होगी ।गांव में भी लोग जागरूक होते हैं , अपनी समस्याओं का हल खुद सुलझाने में समर्थ होते हैं और अगर असमर्थ होते हैं तो पूरा यत्न करते हैं कि उनकी समस्या सुलझ जाए। पर किशनगढ़ की लाखों की आबादी आज भी अपनी समस्याओं के बारे में चुप है। उन्हें तो जो थाली में परोसा गया है, उसे खाने को मजबूर है ।
जनता चुप , नेता चुप ,मीडिया चुप ,सरकार तो चुप ही रहेगी । किसी को कुछ नहीं पड़ी है । कोई एक्सीडेंट से मरे ,कोई अपना हाथ पाव तुड़वा ले, कोई स्कूल, कॉलेज के लिए लेट पहुंचे ,कोई ऑफिस लेट पहुंचे, कोई घंटों जाम में फंसे, कोई अस्पताल देरी से पहुंचे या रास्ते में ही मर जाए, तो किसे फर्क पड़ना है? जिसका नुकसान हुआ है वह दो दिन रो कर रह जाएगा या फिर सरकार को, नेताओं को कोसकर अपनी भड़ास निकाल लेगा और फिर अपनी जिंदगी में मस्त हो जाएगा।
एक जगह से दूसरी जगह जहां हम पांच मिनट में पहुंच जाते थे वहां आधा-आधा घंटे में पहुंच रहे हैं ,उससे हमें कोई फर्क नहीं पड़ता। सिर्फ पेट्रोल और डीजल ज्यादा जलता है, उससे ज्यादा फर्क नहीं पड़ने वाला हमें । संसाधनों का कैसे दुरुपयोग किया जाए यह तो हम बहुत अच्छी तरह से जानते हैं!
हम तो इन सबके आदि हो चुके हैं। हम जनता है , हमारी सहनशक्ति बहुत बड़ी है । जमाने ने हमें सहन करना सिखा दिया है ।और यही भोली भाली जनता अपनों को खोकर, अपना कीमती वक्त बर्बाद करके , दिन भर उड़ने वाले धुएं से अपने फेफड़े खराब करके चुप ही रहेगी।
जनता आप कब जागेंगी? दुनिया में एक दिन मैं पूल बन जाते हैं , एक दिन में कई किलोमीटर सड़कें बन जाती है पर हमारे यहां सालों गुजर जाने के बाद भी कुछ नहीं होता ।
इसमें किसका दोष? सरकार का, नेताओं का, ठेकेदारों का, किसका?
इसमें जनता आपका दोष है।
हमारे यहां सड़क बने या ना बने पर सड़कें आए दिन खुद जरूर जाती है। कोई यह जानने की कोशिश भी नहीं करता कि ऐसा क्यों होता है ? क्योंकि हमें सड़के बने या खुदे ,किसी से कोई लेना देना नहीं। हमें एक रास्ता बंद है तो दूसरा रास्ता मिल जाता है। चाहे हम घंटों फंसे रहे या उसमें घंटों लग जाए अपने डेस्टिनेशन तक पहुंचने में, हमें कहां फर्क पड़ता है । सिर्फ पेट्रोल- डीजल ही तो ज्यादा जलता है, समय तो हमारे पास वैसे भी बहुत है।
आप कहेंगे इसमें हम क्या कर सकते हैं ? यह तो सरकार का काम है, सरकार अपनी मर्जी से काम करेगी, जब मन करेगा काम करेगी, जब मन नहीं करेगा – बंद कर देगी । इसमें कोई बड़ी बात नहीं है ? इसमें किसी का दोष भी नहीं है ? किसी को सवाल जवाब करने की ताकत जनता में बची ही नहीं है। बिचारी अपनी 2 जून की रोटी कमाने में व्यस्त है।
जनता इसमें किसी और का दोष नहीं है , दोष तो सिर्फ जनता आपका । क्योंकि आपको इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। अपना अधिकार मांगना आप भूल गए हैं । 75 साल पहले कोई आया था हमें आजादी दिलाने के लिए ,वैसे ही अभी भी कोई आएगा हमें हमारी समस्याओं से निजात दिलाने के लिए । हम उसी का तो इंतजार कर रहे हैं। शायद हम किसी सांता क्लॉस का इंतजार कर रहे हैं कि वह आएगा और हमारे हक के लिए लड़ेगा और सब कुछ ठीक कर जाएगा। उसी सांता क्लॉस के इंतजार में हम आज भी बैठे हैं।
जागो ,जनता जागो।
डॉ मंजू राठी
एमबीबीएस एमडी
एलएलबी एलएलएम
लेखिका ,समाज सेविका ,ब्लॉगर।