आत्महत्या- एक सामाजिक बुराई

आत्महत्या- एक सामाजिक बुराई।
क्यों ना हो आत्महत्या के कारणों का विश्लेषण?

“मां ने 4 बच्चों संंग कुएं में छलांग लगाई, चारों बच्चों की मौत, मां बची।”
न्यूज़ पेपर में खबर पढ़ी । दिल दहल उठा ,मन खूब रोया।

क्यों ?
क्यों एक मां ने ऐसा किया? क्या वजह रही होगी? उसकी कौन सी ऐसी मजबूरी थी जिससे वह छुटकारा पाना चाहती थी? अगर जिंदगी से ऊब गई थी तो फिर खुद अकेले ही मर जाती, क्यों अपने कलेजे के टुकड़ों को मार दिया? उन मासूमों का क्या दोष था ? वह नासमझ तो इस बात से बिल्कुल अनजान थे कि उनकी मां का क्या इरादा है ? जिन्हें मरने का अर्थ ही पता नहीं वह अपनी मां पर विश्वास करके कुएं में कूद गए ? अगर वह नहीं कूदे तो मां ने उन्हें कुएं में फेंक दिया ? कैसे फेंका ? एक- एक को फेंकते हुए क्या उसका कलेजा नहीं फटा ? उन्हें स्पर्श करते वक्त क्या उसका इरादा नहीं बदला? सुना है, एक तो सिर्फ कुछ ही दिनों का बच्चा था। क्या एक जन्म दात्री ऐसा कर सकती है? जिसने इतनी पीड़ा सहन करके जिन्हें जन्म दिया उन्हीं को स्वयं ने मार डाला ? क्या वजह थी ऐसा कदम उठाने की?

सोचो ,जरा सोचो।
अखबार में खबर पढ़कर उसको नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। कई बार इन चीजों का विश्लेषण करना और सही कदम उठाना भी बहुत जरूरी होता है। जिससे आत्महत्या जैसी सामाजिक बुराइयों पर रोक लग सके।
मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और समाज में रहते हुए उसे ऐसी तमाम खबरों को कभी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

जैसा की ज्ञात हुआ इस महिला के 5 बच्चे थे ।बड़ा बच्चा 7 साल का और छोटा 19 दिनों का। अब देखो, इन 7 सालों में उस महिला ने 5 बच्चों को जन्म दिया, यानी हर सवा- डेढ़ साल में एक बच्चा पैदा हुआ ।सभी जानते हैं , डिलीवरी के बाद एक औरत को वापस अपने शरीर की ताकत लाने में कम से कम 3 साल लगते हैं । पर यह महिला तो हर डिलीवरी के 6-7 माह बाद वापस गर्भवती हो जाती है और फिर बच्चा पैदा हो जाता है । कमजोर शरीर, बच्चों का लालन पोषण, फिर डिलीवरी की वेदना , फिर उस बच्चे को स्तनपान , फिर उनका और घर का काम । वह कोई अमीर खानदान की नहीं थी जिसके पास नौकर चाकर हो , घर का काम कोई और देखता हो, बच्चों को कोई और संभालता हो। वह एक गरीब परिवार से ताल्लुक रखने वाली महिला थी जिसे रोज सुबह उठकर रात तक घर और बच्चों को संभालना होता था और रात को पति को।

सोचो, क्या बीती होगी उस औरत पर। 5 बच्चों की मां ,शरीर से कमजोर, दिन भर अपने संसार में उलझी हुई , कभी किसी से बात करने की फुर्सत नहीं, घर में कोई और औरत नहीं जिसके साथ अपनी मन की बात साझा करें , पति सुबह बाहर जाता है तो घर गृहस्थी चलाने के लिए 2 जून की रोटी जुटाने तक शाम हो जाती है । ऐसे में वह अपनी पीड़ा किसे कहें? क्या रही होगी उसकी मानसिक स्थिति?

अगर उसकी मानसिक स्थिति ठीक नहीं थी तो फिर उसे डॉक्टर को क्यों नहीं दिखाया? आज वह जहां रह रही थी वहां पर आस पास अनेकों अस्पताल है ,जहां पर मुफ्त में इलाज होता है। सरकार ने अनेक योजनाएं शुरू कर रखी है जिसमें मुफ्त में इलाज होता है ,मुफ्त की दवाइयां मिलती है । जहां पर बच्चा पैदा करने से लेकर गर्भनिरोधक उपायों पर अनेक सरकारी योजनाएं हैं । फिर यह परिवार इन योजनाओं से वंचित कैसे रह गया?

7 साल में 5 बच्चे पैदा करना अपने आप में आत्महत्या करने जैसा नहीं है? आप कहेंगे पहले के जमाने में तो 10- 10 बच्चे पैदा कर लेते थे, कुछ नहीं होता था । पर अब ऐसा नहीं है । आज की औरत की और पहले की औरत की मानसिक और शारीरिक स्थिति में बहुत बदलाव आ चुका है। खान -पान ,रहन- सहन सब बदल चुका है।पहले और आज में जमीन- आसमान का फर्क हो चुका है ।आज हम 21वीं सदी में जी रहे हैं, जहां पर मिलावट खोरी, महंगाई , बेरोजगारी ,बढ़ती आबादी ऐसी कई समस्याओं से जूझ रहे हैं। अब हमारा नारा “हम दो- हमारे दो” यह है । सरकार इन योजनाओं पर देश के टैक्सपेयर का करोड़ों रुपए खर्च कर रही हैं और नतीजा क्या? क्या यह उस महिला की मजबूरी थी या फिर सरकारी योजनाओं की विफलता?

सोचो ,जरा सोचो।
पढ़ा था कि महिला ने छलांग लगाई और पेड़ पर अटक गई। अब सोचो ,वह महिला पेड़ पर अटकी हुई है और उसके चार मासूम उस कुएं में डूब रहे हैं, क्या मनोदशा रही होगी उसकी ? इसकी कल्पना भी कर सकता है कोई? गांव वाले आकर उसे बचा लेते हैं और उसके चारों मासूम इस दुनिया से अलविदा कह देते हैं। अब बताओ, अब उस औरत की क्या दशा होगी? एक हत्यारिन का कलंक लेकर कैसे जिएंगी वह। एक औरत होने के नाते, एक मां होने के नाते ,समाज की बुद्धिजीवी महिला होने के नाते और बाकी समाज के लोग ,इस बारे में सोचना जरूर।

जो पहले से ही तनाव में थी क्या इस घटना के बाद उसका मानसिक तनाव कम हो गया होगा ? अब उसके बचे हुए एकमात्र बेटे को अपनी मां से डर नहीं लगेगा ? क्या वह कभी उसे एक ममतामयी मां के रूप में देख पाएगा? उसे कभी मां कह पाएगा? जब भी वह अपने भाई बहनों को याद करेगा सबसे पहले उसे हत्यारे के रूप में कौन दिखाई देगा ? क्या मां को देखने के बाद वह डर के मारे सहम नहीं जाएगा?

अब देखते हैं इस घटना की जिम्मेदारी कौन -कौन ले सकता है ।

एक पति होने के नाते क्या अपनी पत्नी की इस मनोदशा का वह उतना ही जिम्मेदार नहीं है ? जितना कि उसकी पत्नी जिम्मेदार है? भले ही उसने अपने 4 मासूमों को मारा हो लेकिन परिस्थितियां क्या बनी ,कैसे बनी, जिससे उसको इस हद तक जाना पड़ा। बार-बार गर्भवती कर के उसकी सेहत को इस हद तक ले जाने के लिए आखिर जिम्मेदार कौन है ? क्या पति इसके लिए कदापि जिम्मेदार नहीं? अपनी आमदनी, अपनी हैसियत देखकर बच्चे पैदा करना और उनका पालन पोषण करने का काम पति का था तो फिर इन सब के पीछे पति की जिम्मेदारी कहां तक बनती है ?

घर में बड़े बुजुर्ग के नाते ससुर का होना और अपने बेटे को अपनी हैसियत के हिसाब से घर में बच्चों की संख्या सीमित रखने के लिए , घर की परिस्थिति के अनुसार चलने के लिए पुत्र को ना समझाना, इस के लिए क्या पिता जिम्मेदार नहीं है ? पिता होने के नाते अपने बेटे को समझाना, उसकी भलाई- बुराई का उसे ज्ञान देना, बहू का ख्याल रखना , पोते -पोतियों के लिए उसकी जिम्मेदारी क्या है? इन सभी का विश्लेषण नहीं किया जाना चाहिए?

अब भविष्य की सोचते हैं ।
उस औरत पर क्या बीत रही होगी? जिसने अपने 4 मासूमों को मौत के घाट उतार दिया और खुद बच गई । अब उसकी मानसिक स्थिति कैसी रहेगी ?उसकी आगे की जिंदगी कैसे रहेगी? उस औरत के पति की क्या स्थिति होगी?

जो घर बच्चों की किलकारीयों से गूंज उठता था वहां अब सन्नाटा है ।क्या वह उस औरत को एक पत्नी के रूप में कभी अपना पाएगा? क्या उस औरत में उसके 4 मासूमों की हत्यारिन नजर नहीं आएगी ?

उस इकलौते किस्मत से बचे हुए हैं बच्चे पर क्या गुजर रही होगी? चार भाई-बहनों को खोकर जिंदगी भर अकेला रहने का दुख ।बचपन से मन में बसा हुआ डर की कोई मुझे मार ना दे? मां को देखते ही आंखों में नजर आने वाला खौफ ।एक ममतामयी मां की छवि उसके दिल में कभी बन पाएगी ? उसकी मानसिक स्थिति का अंदाजा क्या आप और हम लगा पाएंगे? क्या वह कभी चैन की नींद सो पाएगा?

अपने बुढ़ापे में बिखरा हुआ परिवार और 4 पोते- पोतियों को खोने के बाद स्वयं के जिंदा रहने का अफसोस एक दादा को नहीं होगा ? अपनी तोतली जुबान से दादा -दादा सुनने वाले को उस घर में कभी वह आवाज दोबारा सुनाई देगी?

एक चाचा जिसका इस घटना से कोई डायरेक्ट संबंध नहीं, उसे भी अपने प्यारे- प्यारे भतीजे भतीजी को खोकर कितना दुख हुआ होगा ? उसके लिए वह अपनी भाभी को जिम्मेदार नहीं मान रहा? क्या वह कभी अपनी भाभी को “भाभी “कह पाएगा? क्या इसके लिए वह अपने भाई को जिम्मेदार नहीं ठहरा रहा?

समाज , समाज का क्या? दो दिन बढ़-‘चढ़ कर ,दुख जताकर इस न्यूज़ पर चर्चा करेंगे , थोड़ी सी हमदर्दी जतायेंगे, एक दूसरे पर टिप्पणी करेंगे, अपने आप ही सजा सुनाएंगे और कानून पर राय देंगे। सरकार को गरीबी के लिए कोसेंगे, और 4 दिन बाद सब भूल कर अपनी दुनिया में मस्त हो जाएंगे ।

अब कानून क्या कहेगा ऐसी घटनाओं पर? 4 बच्चों की हत्या के लिए किसे जिम्मेदार ठहराया जाएगा, उस औरत को, उस औरत को ऐसा कदम उठाने के लिए और ऐसी परिस्थिति निर्माण करने के लिए जिम्मेदार व्यक्तियों को, उसके पति को, उनकी गरीबी को, सरकार को, समाज को, किसको ?

सोचने वाली बात यह है कि ऐसी घटनाओं का विश्लेषण हो। चुनाव में हार जाने पर पार्टी हार के कारणों का विश्लेषण करती है और उन कारणों का निराकरण करने की कोशिश करती है , वैसे ही ऐसी घटनाओं का विश्लेषण हो और उन कारणों का निराकरण करने की पुरजोर कोशिश हो।

संसद में ऐसे मुद्दे उठे। जनता के प्रतिनिधि इन मुद्दों पर सकारात्मक चर्चा करें। एक दूसरे पर दोषारोपण करके संसद का समय बर्बाद ना करते हुए अपनी जनता के लिए, अपने समाज के लिए , कुछ अच्छा करने के लिए कायदे कानून बनाए । भविष्य के लिए कुछ ऐसी योजनाएं बनाएं जिससे ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति ना हो ।

यह एक घटना नहीं है ।देश में हर रोज ऐसी अनेक घटनाएं घटित होती है। जिसके लिए जिम्मेदारी इसी देश को लेनी है। इस देश का नागरिक होने के नाते ,उसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी सरकारों की बनती है। आप सभी भी
यह मेरे घर की घटना नहीं है यह सोचकर चुप ना बैठै।

जगाईयें – इस समाज को, इस जनता को, इन सरकारों को, जो अपने देश के बच्चों की रक्षा के बारे में सोचें । आए दिन होने वाली इन हत्याओं, आत्महत्याओं पर वाकई बहुत कुछ काम होना बाकी है । देश के भविष्य को भगवान भरोसे ना छोड़े ।संसद में ऐसे विषयों पर खुलकर चर्चा हो, समाज सेवी संगठन आगे आए, सरकार से सवाल पूछे , नेताओं को अपनी जिम्मेदारी का एहसास दिलाए , समाज को जागृत करें और देश का हर नागरिक सुरक्षित और स्वस्थ कैसे रहें इस पर काम करें।

लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहने वाले मीडिया वालों को सिर्फ यह खबर छाप कर अपना कर्तव्य पूरा नहीं करना चाहिए ।उन्हें भी ऐसी घटनाओं के तह तक जाने की जरूरत है, उनके कारणों का विश्लेषण करके समाज की इस बुराई को खत्म करने के लिए कुछ कदम उन्हें भी उठाना जरूरी है। फिर चाहे भले ही वह अपनी लेखनी से क्यों ना हो।

धन्यवाद ।
डॉ मंजू राठी
एमबीबीएस ,एमडी
एलएलबी, एलएलएम
समाजसेविका, ब्लॉगर एवं लेखिका।

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