विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यू एच ओ ) के अनुसार स्वास्थ्य की परिभाषा यह है कि,” दैहिक (शारीरिक ) , मानसिक और सामाजिक रुप से पूर्णता स्वस्थ होना( समस्या विहीन होना ) ही स्वास्थ्य है।”
मतलब किसी व्यक्ति की शारीरिक , मानसिक और सामाजिक रूप से अच्छे होने की स्थिति को स्वास्थ्य कहते हैं ।अगर स्वास्थ्य इसे कहते हैं तो फिर स्वास्थ्य का अधिकार (राइट टू हेल्थ ) बिल भी इन सभी स्वास्थ्य का विचार करके ही लाया गया होगा ? अगर सरकार स्वास्थ्य की परिभाषा सिर्फ शारीरिक स्वास्थ्य को देखकर कर रही है तो वह सरासर गलत है। सरकार की मंशा है कि वह ऐसे कानून बना दें जिससे सरकारी तंत्र मजबूत होता दिखता हो, सरकार की ताकत में इजाफा हो और सरकारी खर्च ना हो । जिसके लिए यह बिल लाया जा रहा है उस जनता को तो पता ही नहीं कि इस बिल में क्या है , उसे इस बिल से कोई मतलब नहीं है क्योंकि वह तो जानती भी नहीं कि यह बिल है क्या बला! यह बिल तो सरकार के लिए लाया जा रहा है जिससे सरकारे सोचती है कि उनका वोट बैंक मजबूत होगा पर ऐसा कुछ होने वाला नहीं है , यह उनकी गलतफहमी है। इस बिल से जनता को सब्जबाग दिखाए गए हैं लेकिन यह बिल असलियत से कोसों दूर है और उसके आगामी परिणामों का तो पता ही नहीं है।
ऐसे बिना सोच विचार करें लाऐ हुए इस बिल से सरकार समझती है, जनता का फायदा हो जाएगा और उन्हें सस्ती पब्लिसिटी मिल जाएगी। और शायद, जनता भी यही समझती है यह बिल उनके लिए बहुत ही फायदेमंद होगा, इसमें मुफ्त का इलाज होगा, इमरजेंसी में आप किसी भी अस्पताल में जाकर सेवाएं ले सकते हैं वह भी बिना भुगतान किए वगैरह वगैरह। लेकिन जरूरी नहीं कि हर मुफ्त की चीज अच्छी हो। और आप सभी जानते हैं मुफ्त की चीज की कोई कीमत नहीं होती और कोई उसकी कदर नहीं करता।
जागो, जनता जागो !
इस बिल को समझो। इसके आने से आप की स्थिति क्या होगी इस पर भी जरा सा गौर करना । यह नहीं कि मुफ्त की रेवड़ियां आपको अच्छी लगने लगे और आप यह सोचना भूल जाए कि आपकी जिंदगी की कीमत अनमोल है और यह मुफ्त की रेवड़ियां उसकी भरपाई नहीं कर सकती। आपकी जिंदगी कहीं अधिक कीमती है। इन मुफ्त की रेवड़ीओं से कहीं आप लालच में न आ जाए और अपनी जिंदगी को दांव पर ना लगा बैठे।
आप कहेंगे ऐसा क्या है इस बिल में जो सरकार हमारी भलाई के लिए लेकर आ रही है और डॉक्टर कह रहे हैं कि बिल आपकी भलाई के लिए नहीं है। जनता , आपने कभी इस बिल को पढा़ है ? इसके आगामी परिणामों के बारे में कभी सोचा है? शायद नहीं , तो अब वक्त आ गया है इसे समझने का।
आप सोचते होंगे कि बिल आपके लिए तो बहुत अच्छा है इमरजेंसी में डॉक्टर के पास जाओ , दिखाओ, इलाज कराओ और बिना पैसे दिए ही वापस आ जाओ।
यह अच्छा है क्योंकि इमरजेंसी में आप किसी भी अस्पताल में जाकर अपना इलाज करवा सकते हैं लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि आप इमरजेंसी में इलाज कराने के बाद हॉस्पिटल का बिल अदा ना करके सीधे चले जाए । अगर ऐसा हर कोई करने लग गया तो उसका परिणाम क्या होगा सोचा है कभी आपने?
इमरजेंसी का मतलब क्या है यह इस बिल में कहीं पर भी नहीं लिखा गया है । किसी के लिए कान में दर्द इमरजेंसी है, किसी के लिए पेट में दर्द इमरजेंसी है, किसी के लिए बुखार इमरजेंसी है , तो आखिर में इमरजेंसी की परिभाषा क्या है ? इस बिल में कहीं पर भी इमरजेंसी की कोई परिभाषा नहीं की गई है और इमरजेंसी में इलाज कहां तक किया जाए इसकी भी कोई गाइडलाइन नहीं है। ऐसे में अगर मरीज का 100-200 रु में इलाज हो जाता है तो शायद डॉक्टर यह इलाज फ्री में भी कर दें ।लेकिन अगर किसी मरीज का हजारों में बिल बनता है और वह मरीज इमरजेंसी में मुफ्त में इलाज करवा कर बिना पेमेंट के अस्पताल से रुखसत हो जाता है तो आप जानते हैं इसका परिणाम क्या होगा? अगर दूसरा कोई मरीज इमरजेंसी में आता है और डॉक्टर से इलाज की उम्मीद रखता है तो क्या डॉक्टर उसे इसी तरह इलाज दे पाएगा? ऐसे में क्या होगा ? मानो, कोई मरीज छाती में दर्द करके आता है, ऐसे में डॉक्टर उसे एक डिस्प्रिन की गोली देकर आगे रेफर कर देगा और जो वह इलाज का गोल्डन वक्त होता है उस वक्त में अगर मरीज को सही तरीके से इलाज नहीं मिला और वह एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल में और अंत में सरकारी अस्पताल के लिए भटकता रहा तो उसका क्या अंजाम होगा कभी सोचा है किसी ने?
जरा सोचना!
डॉक्टर को कुछ नहीं मिलता मुफ्त में। अपने बच्चों की पढ़ाई के लिए, अपना घर चलाने के लिए, अस्पताल का खर्चा उठाने के लिए ,दवाइयों का खर्चा उठाने के लिए ,अपने स्टाफ का खर्चा उठाने के लिए , अपना लोन चुकाने के लिए उसको दिन रात मेहनत करनी पड़ती है और ऐसे में हर मरीज अगर इमरजेंसी करके आ गया और बिना भुगतान करें हॉस्पिटल से निकल गया तो इसके दूरगामी परिणामों की व्याख्या करने कि शायद मुझे जरूरत नहीं है ।
इमरजेंसी के नाम पर दिए गए इलाज का भुगतान कौन करेगा इसका स्पष्ट प्रावधान इस बिल में होना चाहिए और वह कितने वक्त में होगा । यह भुगतान सरकार करेगी ,इंश्योरेंस कंपनी करेगी या कोई और करेगा और वह सालों में नहीं चंद घंटों में होना चाहिए। जैसे इमरजेंसी में चंद घंटों में इलाज दिया जाता है उसी तर्ज पर भुगतान भी चंद घंटों में हो जाना चाहिए।
क्या कभी होटल वाला फ्री में खाना देता है? ऐसा होता तो आज लाखों लोग भूखे नहीं सोते ।अगर जनता के लिए इलाज जितना जरूरी है उससे कहीं गुना ज्यादा उसको खाना मिलना जरूरी है , स्वच्छ पानी मिलना जरूरी है ।बिजली मिलना उतनी ही जरूरी है ।
क्या सरकार यह चीजें उपलब्ध करवा पा रही है ? अगर यह कर पा रही है तो फिर राइट टू हेल्थ का बिल भी उसी तरह से बनना चाहिए जिस तरह से यह बाकी चीजें सरकार जनता को दे रही है। उसके लिए आप सोसाइटी के एक तमगे के लिए कोई कानून कैसे बना सकते हो? जब आप किसी दूसरे धंधे के लिए उनकी कीमतों पर अंकुश नहीं लगा सकते और जब हॉस्पिटल को व्यवसाय के रूप में ही माना गया है तो फिर आप डॉक्टर के रूप में अस्पताल का व्यवसाय करने वाले डॉक्टरों की फीस और अस्पताल की कीमतों पर कैसे अंकुश लगा सकते हो? जरा सोचना।
अगर आपका मकसद सिर्फ कानून बनाना ही है तो फिर जिस कानून में सबसे ज्यादा स्टेकहोल्डर जो कि एक डॉक्टर है उस में भी सबसे ज्यादा प्राइवेट अस्पतालों का इसमें समावेश है ,तो उन प्राइवेट अस्पतालों के एसोसिएशन के डॉक्टरों की राय नहीं लेनी चाहिए थी?
इस बिल में मरीजों के अधिकार तो दिये हैं वैसे डॉक्टरों के अधिकार क्यों नहीं दिए गए हैं?
जरा सोचो,
डॉक्टरों के और अस्पतालों के अधिकार क्यों नहीं होने चाहिए?क्या उन्हें अपने अधिकार मांगने का हक नहीं है? क्या वो समाज का हिस्सा नहीं है? क्या वे इस स्टेट का हिस्सा नहीं है? “राइट टू लाइफ ” का अधिकार तो डॉक्टर को भी है ।
क्या सरकार प्राइवेट हॉस्पिटल मैं होने वाला खर्चा जैसे कि बिल्डिंग का खर्चा ,दवाइयों का खर्चा, स्टाफ की सैलरी , बिजली का बिल स्वयं उठाती है जैसे वह सरकारी अस्पताल में उठाती है ?
अगर वह सरकारी अस्पतालों की तर्ज पर यह सारी सुविधाएं प्राइवेट अस्पतालों में नहीं दे सकती है तो फिर उन्हें प्राइवेट अस्पतालों से मुफ्त इलाज करने की उम्मीद भी नहीं रखनी चाहिए ।
ऐसे में यह राइट टू हेल्थ बिल सिर्फ सरकारी अस्पतालों के लिए बनना चाहिए फिर वह प्राइवेट अस्पतालों के ऊपर क्यों थोप रही है?
इस बिल में क्या है।
आप यह नहीं जानते इसमें जनता के अधिकार दिए हुए हैं, सरकार ने अपने पास सारे अधिकार रख लिए हैं। और जो इन सेवाओं को देगा – डॉक्टर और हॉस्पिटल उनका तो उसमें उल्लेख तक नहीं है ।उन्हें क्या चाहिए ,उनके लिए क्या ठीक है, उन्हें क्या परेशानी है, उनकी तकलीफ कौन सुनेगा, उनका निस्तारण कैसे होगा, उनकी सेवाओं के लिए भुगतान कौन करेगा ,उनके खिलाफ होने वाली शिकायतों को कौन सुनेगा ।
हां,सरकार ने शिकायत निवारण कमेटी का गठन करने का प्रावधान तो किया है लेकिन उसमें क्या कमियां है इसे आप समझ पाएंगे?
शिकायत निवारण कमेटी के गठन में अगर डॉक्टर नहीं होगा तो कोई अधिकारी डॉक्टर की समस्या को अच्छी तरह से समझ पाएगा?
क्या सरकार प्राइवेट अस्पतालों पर अफसर शाही का दबदबा बनाना चाहती है ? अफसर अपनी मर्जी से किसी भी डॉक्टर या अस्पताल के विरुद्ध कार्रवाई करें पर अफसरों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं कर सकता। अफसरों को मनमानी शक्तियां देकर उन्हें डॉक्टरों पर बेमतलब का अंकुश लगाने की चाबी दे दी है।किसी भी अस्पताल में कभी भी घुसकर कुछ भी डॉक्यूमेंट मांगना और ऊपर से कोई भी नोटिस थमा देना या अगर कोई शिकायतकर्ता है तो उस शिकायत का अपने स्तर पर निवारण करना और डॉक्टरों को वह निर्णय मान्य करने के लिए बाध्य करना, क्योंकि डॉक्टरों को इसके लिए कोर्ट में शिकायत करने का कोई अधिकार नहीं है ।क्या इन सभी बातों से होने वाले नुकसान का कभी किसी ने आकलन किया? क्या ऐसे प्रावधानों से डॉक्टरों के मूलभूत हक्कों का हनन नहीं हो रहा है?
आज के इस स्वतंत्र देश में अगर इस तरह अफसरशाही हावी हो गई तो इस स्वतंत्रता का क्या लाभ ?;फिर तो अंग्रेजी हुकूमत से हमने लोहा क्यों लिया? इस दिन के लिए ? अपनी राजनीति करने के लिए डॉक्टरों की परेशानियों को नजरअंदाज करना, जो इस बिल का महत्वपूर्ण हिस्सा है ,क्या यह जायज है? कभी सोचा है आपने, इस तरह के निर्णय से डॉक्टरों के मूलभूत अधिकारों का हनन नहीं होगा ? क्या अधिकारियों का लिया हुआ निर्णय सर्वोपरि सर्वमान्य होना चाहिए?
डॉक्टरों को राइट टू लाइफ यानी जीने का अधिकार नहीं है। राजनीति करने वाले सही कहते हैं , “डॉक्टरों को कमाना नहीं चाहिए, उन्हें तो सिर्फ सेवा करनी चाहिए ।” जैसे कि उनके परिवारों को सरकार पालती हो?
आप ही बताइए-
क्या डॉक्टर को मुफ्त में इलाज करना चाहिए और अपने परिवार की और अपनी सारी जिम्मेदारियां सरकार पर छोड़ देनी चाहिए? क्या सरकार उन सभी डॉक्टरों की जिम्मेदारियां उठा पाएगी?
जागो जनता जागो।
जागो सरकारों, जाग जागो।
जनता अभी भी वक्त है जाग जाइए । जो “मुफ्त इलाज ” के सब्जबाग आप देख रहे हैं वह कहीं बुरा सपना बनकर ना रह जाए। कहीं ऐसा ना हो प्राइवेट डॉक्टर हर एक फ्री की इमरजेंसी को रेफर करने पर मजबूर ना हो जाए और जो इलाज आसानी से और सही वक्त पर हो सकता था उससे आप दूर ना हो जाओ और इससे आपको कहीं नुकसान ना भुगतना पड़े। इमरजेंसी में वक्त पर इलाज नहीं मिलने पर परिणाम क्या होगा यह किसी को बताने की जरूरत नहीं होगी ।दूर की सोच है पर बहुत सही है।
डॉक्टरों की फीस सरकारे तय करेगी जैसे आज तक दाल, चावल, दूध और खाने की चीजें या किसी और धंधे की कीमतें तय करती आई हो ? कभी वकील ,आर्किटेक्ट ,इंजीनियर की फीस तय की है? क्या खाना, अच्छी सड़कें , शुद्ध पानी , बिजली इत्यादि जनता के मूलभूत अधिकार नहीं है ? क्या इन पर कभी यह लोग जो जनता के प्रतिनिधि है कभी रोक लगा पाएंगे ? इन चीजों को फ्री में बांट पाएंगे? टोल टैक्स की छुट्टी, बिजली का बिल, पानी का बिल, होटल में खाना सरकारे मुफ्त में दे पाएगी ?
सरकारें जनता के प्रतिनिधियों से बनती हैं लेकिन जनता कौन है ? डॉक्टर तो किसी जनता की सूची में आते ही नहीं , क्योंकि वह ना तो किसी की वोट बैंक है , ना ही उसे राजनीति में कोई रुचि है , वह तो ” बंधुआ मजदूर” है जिसका अपना कोई अधिकार नहीं होता।
यह बिल सस्ती लोकप्रियता पाने के लिए ,जनता की सहानुभूति पाने के लिए लाया जा रहा है ।जिससे जनता की सेहत तो सुधरेगी कि नहीं ,यह नहीं बता सकते , लेकिन सरकार की सेहत जरूर सुधर जाएगी।
क्योंकि वह सोच रही है की इस बिल के लाने से उनका वोट बैंक में इजाफा जरूर होगा और आगे आने वाले चुनाव में इस बिल को कैश करने का वक्त आ जाएगा।
जागो ,जनता जागो ।
कम से कम अपनी परवाह तो करो और अपना भला-बुरा खुद समझो। कहीं ऐसा ना हो वक्त बेवक्त आप किसी प्राइवेट अस्पताल में आए और आपको वहां ताला मिले।
डॉ.मंजू राठी
एमबीबीएस. एमडी.
एलएलबी . एल एल एम.
राइटर, ब्लॉगर और समाज सेविका।