आसमां

मैं और मेरी तन्हाई अक्सर यह बातें करते हैं ,
ऐसा होता तो क्या होता ?
वैसा होता तो क्या होता है?
पर ऐसा कुछ भी तो नहीं हुआ ,जो हुआ वह मैंने कभी सोचा भी नहीं था। बचपन में आसमां में उड़ते पंछियों को देखकर सोचा करती थी कि मैं भी उडूंगी ,मुझे भी उड़ना है। मुझे भी आसमां छूना है , और अब——।

मुस्कान सोच रही थी। खिड़की में बैठी आसमां में स्वच्छंद विचरण करने वाले पंछियों को देख कर उसे अपना बचपन याद आ गया, बचपन में देखा वह सपना याद आ गया। पर अब वह बचपन कहां है ? बचपन का वह सपना कहां खो गया ? क्या ! सब कुछ यही होना था तो फिर वह सपना क्या था ? क्यों इंसान सपने देखता है , जिसके पूरा होने का दूर-दूर तक कोई नामोनिशान नहीं होता , ऐसा सपना वह देखता ही क्यों है ? अगर मेरे सपनों का यही हश्र होना था तो मैंने वह सपने देखे ही क्यों? क्यों मैं उस दुनिया में जीती रही जो मेरी कभी होनी ही नहीं थी ।सपनों की दुनिया और असल दुनिया का अगर कोई कोई संबंध नहीं तो फिर यह लोग क्यों कहते हैं , ” सपने देखो, सपने देखना अच्छा होता है ,सपनों से आसमां छू सकते हैं , वगैरह वगैरह। मैं तो आसमां क्या मेरी घर की छत भी नहीं छु सकती।
आज मैं पच्चीस साल की हूं और मेरी जिंदगी क्या है यह जानना नहीं जाओगे आप ?

बचपन की ” मुस्कान ” , जिसका नाम मुस्कान, जो सिर्फ मुस्कुराना जानती थी, जो सबको मुस्कुराना सिखाती थी, उसकी मुस्कान आज कहां खो गई? क्या वह मुस्कान वापस लौटेगी? क्या मुस्कान कभी उस सपनों की दुनिया में सैर करेगी? शायद नहीं, कभी भी नहीं । क्योंकि मुस्कान की जिंदगी बदल चुकी है, मुस्कान बदल चुकी है , वह मुस्कान कहीं खो चुकी है।

मुस्कान खुश थी। मुस्कान स्कूल जाती थी । मम्मी पापा बहुत प्यार करते थे उसे । घर में सबसे छोटी जो थी , सबकी लाडली थी। चार भाई बहनों में सबसे छोटी। बड़ी बहन , फिर दो भाई और फिर मुस्कान । सभी पढ़ते थे, पापा कोशिश करते थे कि सबको अच्छी पढ़ाई करा कर एक अच्छी जिंदगी दे। उनकी सोच अच्छी थी पर शायद मुस्कान की तकदीर अच्छी नहीं थी।

बड़ी बहन की पढ़ाई पूरी होते ही उसके लिए रिश्ते आ गए । अच्छा लड़का, अच्छा घर था । पापा को लड़का पसंद आ गया। बहन भी राजी थी। सब कुछ ठीक था पर मुस्कान की तकदीर खराब थी। उनकी शर्त बड़ी अजीब थी , उनके बड़े बेटे जिसके साथ बड़ी बहन का विवाह होना था उसका छोटा भाई भी था और उसकी शादी भी वह साथ ही करना चाहते थे। उनकी नजर मुझ पर पड़ी और उन्होंने मेरा हाथ मांग लिया। मैं सिर्फ 19 साल की थी तब । पापा शुरू में तो मना करते रहे,” बेटी छोटी है , उसकी पढ़ाई बाकी है” , पर पता नहीं उन्होंने मम्मी पापा को कैसे मना लिया। पापा बिचारे मिडिल क्लास फैमिली के, तो सोचा अच्छा घराना है, लड़का अच्छा है , अच्छी नौकरी है , अच्छी तनख्वाह है। एक साथ दो बेटियों की शादी हो रही है तो खर्चा भी बच जाएगा और शादी भी धूमधाम से हो जाएगी। आज नहीं तो दो-तीन साल बाद शादी करनी ही है तो फिर कर देते हैं शादी अभी , क्योंकि मेरी आगे की पढ़ाई के लिए उन्हें कोई एतराज नहीं था। मेरी राय पूछी तो गई थी पर मैंने मेरे ‘ना ‘ कहने का ज्यादा असर नहीं हुआ और मेरा विवाह हो गया मेरी बहन के साथ साथ। इस घर से मेरा नाता छूट गया या यूं कहो टूट गया। बेटी पराई हो गई। अब बेटी का ससुराल उसका घर यह रूढ़िवादी सोच अब भी कायम है और आगे भी कायम रहेगी, मैं उसमें अपवाद कैसे हो सकती हूं?

शादी के बाद पढ़ाई तो जारी रख रही थी कि पता चला कि मैं गर्भवती हो गई । अब पहला बच्चा था तो सब की खुशी का ठिकाना नहीं था और उनकी खुशी कि खातिर मैंने बीस साल की उम्र में एक बच्चे को बेटे के रूप में जन्म दे दिया । दो बोतल खून भी चढ़ा और मैं इतनी कमजोर हो गई कि बच्चा संभालना और खुद को संभालना मुश्किल हो गया और —- मेरी पढ़ाई बीच में ही छूट गई। मेरा बचपन से संजोया हुआ सपना टूट गया । बच्चा संभालते संभालते मैं कब गृहणी बन गई पता ही नहीं चला । बच्चा दो साल का हुआ ही था कि पता चला मैं दोबारा गर्भवती हो गई और नौ महीने बाद दूसरा बच्चा बेटी के रूप में आ गया। चौबीस साल में दो बच्चों की मां बन गई थी। अब तो मेरी जिंदगी उसी में उलझ गई। मैं एक पत्नी का , एक बहू का , एक मां का किरदार निभाते निभाते कब बड़ी हो गई पता ही नहीं चला । पढ़ाई क्या होती है यह तो मैं भूल ही गई थी । बच्चों को कविता सिखाने और एबीसीडी सिखाने तक मेरी पढ़ाई काम आने लगी। सुकून था कि बच्चों को कुछ तो पढ़ा रही हूं बस इतना सा। पर दिल में एक दर्द हमेशा था , काश यह ना होता, कुछ और होता। मेरी किस्मत कहां आसमां छूना चाहती थी और कहां इस घर गृहस्थी की नैया ढोने में जिंदगी गुजर रही है।

मेरे पति अच्छे हैं , मेरे परिवार वाले मुझे बहुत प्यार करते हैं, मेरे बच्चों से मुझे बहुत प्यार है पर इसके अलावा भी मैं कुछ और करना चाहती थी जो हो न सका। मैं फिर भी पढ़ना चाहती थी पर मेरी किस्मत को कुछ और ही मंजूर था ।अगले दो साल में मेरे साथ और भी बहुत कुछ हो गया। मेरी बहन के बच्चा नहीं हुआ और मुझे नसबंदी करवानी नहीं दी गई ।यह समझो भावनाओं में बहकर मैंने नसबंदी नहीं करवाई। दो बार मेरा गर्भपात हो गया आखिरी बार तो मैं मरते- मरते बची। मैंने मेरा जीवन इसी में झोंक दिया ।

मुस्कान की मुस्कान छीन गई और आज इस खिड़की में बैठी मैं अभी उसी आसमां को निहार रही हूं जिसे मैं बचपन में निहारा करती थी। अचानक से एक काला – सा बादल आया और आसमां की आभा को मिटा गया । अचानक यह आसमां बदल गया । अभी यह आसमां अपनी आभा खो चुका है । अभी इस आसमां में कालीमा है , अब तो वो पंछी भी उठ गए। पर इन बादलों से ढके हुए आसमां से एक उम्मीद की किरण आज भी है कि कहीं ना कहीं यह बादल बरसेंगे और यह आसमां पहले के जैसा साफ दिखाई देगा और मेरी जिंदगी में भी मेरे सपनों की वह किरण दिखाई देगी।

डॉ मंजू राठी
एमबीबीएस एमडी
एल एल बी. एल एल एम

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