
जनता का अधिकार।
जागो .जनता जागो ।
आज रविवार था । सुबह -सुबह चाय की चुस्कियों के साथ अख़बार पढ़ रही थी, तभी एक ख़बर पर नज़र पड़ी ।दो दिन पहले तबादला होकर आए ऑफ़िसर सरकारी अस्पताल का मौक़ा मुआयना करने गए । वहाँ की अव्यवस्थाओं को देखकर चिकित्सकों पर नाराज़ हुए और उन्हें सख़्त दिशा निर्देश देकर आए ।
वाह! क्या बात है !
कितने अच्छे ऑफ़िसर आए हैं ! आते ही जनता की सुध लेने निकल पड़े ।जनता ने ऐसा ही सोचा , क्योंकि हमारी सोच यही तक ही है । कुछ लोग हार – माला पहनाने चले गए ।पर क्या , जनता कभी यह समझ पाई हो कि यह वाक़ई कोई ज़रूरी इंस्पेक्शन था ? क्या उन ऑफ़िसर को शहर में आते वक़्त वो अस्पताल दिखा था जहाँ पर उन्हें बाहर से ही अव्यवस्थाएं नज़र आयी हो ? क्या शहर में आते वक़्त उन्हें यहाँ की सड़कें नहीं दिखी ? जिस पर उनकी गाड़ी चल कर आयी। क्या उनकी पीठ में दर्द नहीं हुआ ? क्या उनके ड्राइवर ने किसी मोटरसाइकिल से बचने के लिए कभी झटके से ब्रेक नहीं मारे? क्या उन्हें यहाँ की बेतरतीब ट्रैफ़िक व्यवस्था नहीं दिखी? आडे – टेढ़े पार्क किए हुए वाहन नहीं दिखाई दीये ? शहर में हर जगह होर्डिंग लगे नहीं दिखे , जिसमें से आधे तो ऐसे थे जो हवा के एक झोंके से गिरकर कोई एक्सीडेंट नहीं करते? सड़क पर गहरे गड्ढों में जमा गंदा पानी , कचरे से भरी नालियां , उनका सड़क पर बहता पानी , बदबूदार हवा , जहाँ से गुज़रते वक़्त मुँह और नाक पर रूमाल रखना पड़े । सभी तरफ़ गंदगी ,कचरा , प्लास्टिक की थैलियां , रोड पर आधे से ज़्यादा अतिक्रमण किये हुए ऑटो वाले और सब्ज़ी वाले और ठेले वाले, सड़क पर बेखौफ घूमने वाले जानवर ,गाय ,कुत्ते इत्यादी । आपने ये कुछ नहीं देखा ! देखा तो सिर्फ़ अस्पताल जहाँ पर इससे बेहतर साफ़ – सफ़ाई और अन्य व्यवस्थाएं है । वहाँ आपको अव्यवस्था लगी और बाक़ी सारे शहर में सारी व्यवस्थाएं ठीक है ? क्योंकि अस्पताल की व्यवस्थाएं एक चिकित्सक यानी कोई और देखता है , उसमें त्रुटि हो सकती है पर शहर की सारी व्यवस्था तो प्रशासन के हाथ में यानी कि आपके हाथ में है , उसमें भला त्रुटि कैसे हो सकती है ?
जागो ,जनता जागो ।
अच्छी स्वास्थ्य सेवाएँ ,शुद्ध पानी, शुद्ध हवा और सुखद वातावरण क्या जनता का अधिकार नहीं है ?
जागो और जागते रहो।
डॉक्टर मंजु राठी
एम बी बी एस./एम.डी
एल एल बी / एल एल एम